Free Hindi Book Hawa Ka Jhonka Thi Vah In Pdf Download
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पुस्तक का संक्षिप्त विवरण:
मीनवा नाम था उसका। यूँ तो मीना नाम रखा गया होगा, पर मीना से मीनवा का सफर तय करते कितनी देर लगी होगी उस नाचीज को।
उसकी याद जब भी आती, हवा के ताजे झोंके-सी ही आती। ऐसी बात नहीं कि वह खूबसूरती की बेमिसाल तस्वीर थी, बल्कि उसे बदसूरतों की श्रेणी में रखना ही सही है। काली-काली जुल्फों के बीच वही काला चेहरा, गुदनों से भरा चेहरा। नाक पकौड़े सी फूली, जिसके दोनों ओर बड़ी सी गिलट की लौंग। कानों में अनगिनत तिनके डाल मोटे छेद को और भी मोटा करने की साजिश। एक साधारण अनगढ़ जुड़ा। उसमें खूँसे उड़हुल के फूल की चमक। गले की काली धारियों में काले काले गुदने के नेकलेस। माथे पर गुदने की बिंदी। हाथ में गुदने का कंगन, पाँवों में गुदने की ही मोटी सी पाजेब। इन सबसे सजी मीनवा में कुछ भी तो असाधारण नहीं था। एकदम प्राकृतिक। फिर भी वह जब याद आती, हवा के ताजे झोंके-सी ही याद आती।
बिना थके अनवरत काम करती। जब सफाई से गोल-गोल घुमाते हुए पूरे कमरे में पोंछा लगाती, सोफे पर बैठे हम उसकी सफाई पर चकित रह जाते। अक्सर वह जब उमंग से लबालब भरी होती, अपने गाँव की कहानी कहा करती। बताती कि कैसे पति को छोड़ देने और नया घर बसाने में वह तनिक नहीं हिचकती थी। उसने दो-दो पतियों का घर-संसार त्यागा था। मैं जानकर चौंकी थी।
"हाँ! छोइड देलि दीदी, का तरि रहतली।"
"क्यों? क्या हुआ था?"
जवाब में उसने बताया था कि पहले पति का साथ उसने अखरा में चुना था। ब्याह किया था शौक से सोलह बरस की मीनवा से, फिर दूसरे के घर जाने लगा था... रात-बिरात। कई बार तो रात-रात भर वहीं रहता। तब एक ही झटके में मीनवा ने उसे त्याग, दूसरे का दामन थाम लिया था।
दूसरा क्रूर था। मीनवा भूल नहीं पाती।
"आपन छऊआ के कसाई लेखि मारत रहे, दीदी! बोल का लखे नय छोड़ते? हाथ-गोड़ जला देता था।"
वह मुझसे ही प्रश्न करने लगती। मैं हतप्रभ। मनचाहा कर लेना कितना आसान है इसके लिए। जिंदगी की सारी जिल्लत झेलते हुए भी उस समय आभिजात्य वर्ग की स्त्रियाँ दामन छुड़ा नहीं पाती थीं। उनकी जिजीविषा उनकी छटपटाहट बनकर रह जाती, लेकिन छुटकारे का उपाय आसान नहीं होता।
तिक्त-रिक्त संबंधजनित तड़फड़ाहट उनकी नसों को लाख तड़पाती रहे, बँधे रहने की स्थिति झेलते हुए वे बस घुटा करती थीं... अंदर-ही-अंदर सुलगती हुईं। फल होता था, मानसिक-शारीरिक विकारों का प्रकोप।
मीनवा अब अपने मनचीता पति के साथ थी। वह झारखंड आंदोलन का क्षेत्रीय स्तर का नेता था। मीनवा को उस पर बड़ा अभिमान था।
मैं छेड़ती थी- "क्या मीनवा, तेरा पति नेता है, इसीलिए तू सबसे उलझती रहती है?" वह फिक से हँस पड़ती थी। धवल दंत पंक्तियों दिखाती मीनवा का काला रंग और गहरा उठता।
"फिर क्यों घमंड है उस पर?"
"घमंड नहीं होगा!" वह हिंदी बोलने की कोशिश करती, फिर अपनी भाषा पर उतर आती थी- "ऊ कतइक बड़का-बड़का बात करेला। उकर इजाइत कतइक आहे।"
"वह अलग राज्य की माँग करता है, क्या यह उचित है?"
"कैसेन उचित नखे। उ कहेला, झारखंड अलग होई, तो हमन सोउबे के आपन हक मिली।
हमीन सोउब खुसी से रहेक परोब। हिंया के एतेक संपदा बहरे नीं जाइ।"
मैं जानती हूँ, अपने पति को जुलूस में सबसे आगे देख वह मन में बहुत संतोष का अनुभव करती थी। जुलूस में वह भी शामिल रहती थी। उसके हाथ में परंपरागत तीर-धनुष, होंठों पर नारा-झारखंड अलग करो।... अलग करो।"
माथे पर पसीने की चुहचुहाहट, मन में संतोष की लहर।
आगे-आगे नारा लगाते हुए चलते परसु की गरिमामय चाल को सगर्व निहारती मीनवा का रोम-रोम पुलक उठता था।
पीठ में बेतरा बाँध, जब वह अपने नन्हें, गदबदे बच्चे को कंगारू के पेट में छिपाए बच्चे सा छिपा लेती, मैं मंत्रमुग्ध रह जाती। पीठ के बेतरा में बच्चे को रख संपूर्णता के साथ झटपट निपटाए जाते सारे कार्य। यथा बरतन धोना, कपड़े धोना, मसाला पीसना आदि दंग करने के लिए काफी थे।
नींद की खुमारी में डूबा बच्चा, काम में वह।
कभी-कभार उसका बच्चा गमछा बिछाकर नीचे लिटा दिया जाता, तब मैं सर्द मौसम में उसे उस तरह नंग-धडंग सोते देख दाँतों तले उंगली भी दबाती, अपने बेटे से तुलना भी करने लगती थी। गरम कपड़ों में छुपा मेरा लाल मात्र टोपी नहीं रहने से सर्दी का शिकार हो जाता है, उसे खाँसी-बुखार हो जाता और मीनवा का बेटा एक पतली बुशर्ट में जमीन पर लेटा रहता। दो शर्ट और दो स्वेटर खरीद दिए मैंने, लेकिन वह उसे कम कपड़ों में ही धूप में लिटा देती थी।
एक दिन मीनवा ने आग्रह किया था, "दीदी, हमर घर चलउ नीं। आइज करमा आहे। सब मन हड़िया पी के नचबंय। बड़ा मजा लगी। चलो न दीदी, चलो न।"
मैं उसके अचल आग्रह को टाल नहीं सकी थी। उसके उस अनुरोध ने मेरे आभिजात्य संस्कार को लगभग ठेलकर उसके घर के बाहर ला खड़ा किया था।
वहाँ पीने-पिलाने के दौर के बाद नाच-गाने का माहौल गरम था। बस रोटी-से-रोटी तक.....
Details of Book :-
Particulars | Details (Size, Writer, Dialect, Pages) |
|---|---|
| Name of Book: | हवा का झोंका थी वह | Hawa Ka Jhonka Thi Vah |
| Author: | Anita Rashmi |
| Total pages: | 102 |
| Language: | हिंदी | Hindi |
| Size: | 5 ~ MB |
| Download Status: | Available |
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