Free Hindi Book Phir Meri Yaad In Pdf Download
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पुस्तक का संक्षिप्त विवरण:
जिनके लिए जीना केवल जीते रहने की अनिवार्यता है, उनकी तो नहीं कह सकता पर युग की नियमित ताल से असंगत हम जैसे लोगों के लिए हर साँस एक कौतूहल भरा ईश्वरीय पुर्नस्मारक है। हर पल, हर मोड़, हर आहट पर अन्दर से कोई पुकारता है कि "आओ खलीफा, इसे जी कर दिखाओ।" और उस पल, मोड़ से गुज़र जाने पर, उस अन्दर वाले से जैसे हम चुहल सी करते हैं कि "और कुछ? या हो लिया?" इस आँखमिचौली भरे आवेग में उठते पाँवों ने अपनी अनियमित, उमंग में अप्रत्याशित आ खड़े अवरोधों को कई बार छाती-माथे पर झेला है। चोटों के खुरदरे घाव, सफलता के प्रसाधन-लेपों ने अक्सर ढक दिए पर त्वचा के पीछे उनकी हर करवट, हर मौसम, हर रात चसक-चसक कर साँस लेती रही है। मैंने उन टीसती साँसों को अक्सर गुनगुनाया है। लगता है चोट खाई मेरी साँसों की इस खुरदरी रेशम-डोर में पूरी एक दुनिया बँधी है, नहीं तो क्यों करोड़ों लोग मेरे एकांतिक सुर का कोरस बनते? तालियों, शॉलों-दुशालों और आह-वाह के इस नियमित शोर के बाहर खड़ा हुआ मैं, खुद को अक्सर स्कूल की आखिरी घंटी का इंतजार करते पाता हूँ, जैसे लकड़ी कि टिकटी में बँधे मुर्दा पीतल पर पहली थाप पड़ते ही पैरों को पंख बनाकर उड़ चलूँगा-कहाँ... किस ओर... सच में नहीं पता। हाँ, इतना अन्दाज़ा है कि जहाँ पहुँचूँगा, उस छोर पर इस जन्म में मेरे अन्दर से गुज़र रही इस धारा का आखिरी किनारा जरूर होगा। वहीं बाट जोहूँगा, एक-दो जन्म उसकी, जन्म-जन्मांतर से जिसका हूँ।
'फिर मेरी याद' इस बार की इस यात्रा में आए कुछ पड़ावों के गाते-गुनगुनाते पल हैं। आप सब और मैं शब्दों की जिस हाट में दिल-जिस्म-जाँ लुटाकर बौराए, मगन-मन नाच रहे हैं, यह किताब उसी आस्ताने का लोबान है, खुशबू सहेज लीजिए। क्या फर्क पड़ता है कि उनवान गजल का मिसरा है या गीत की ध्रुव पंक्ति। वक़्त की तितली दो पल के लिए हथेली चूमकर अपने पंखों का जो चटक रंग मेरी अँगुलियों पर छोड़कर गई थी, उसी रंग से यह किताब जिल्द में ढली है। जरा हौले से, जरा प्यार से....
- कुमार विश्वास
गीत
अभी-अभी एक गीत रचा है तुमको जीते-जीते
एक चेहरा था. दो आँखें थीं
एक मैं हूँ यहाँ एक तू है
कुछ छोटे सपनों के बदले
लव-कुश की पीर
फिर भी तुम्हारे चरण मेरी कामनाएँ हैं
तुम से कौन कहेगा आकर?
मेरे मन तेरे पागलपन को
भारत गीत
बहुत देर से सोकर जागी
पल की अक्सर नादानी
सातवें आसमान पर, चल ना!
चंदा रे! गुस्सा मत होना!
सच के लिए लड़ो मत साथी
शांत रहो, कोलाहल है।
घर कब तक आओगे
अब से हम भी मौन रहेंगे
अँधेरे वक़्त में भी गीत गाए जाएंगे
हम हैं देसी हाँ मगर हर देश में छाए हैं हम
होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो
कविता
बच्चों के क्या नाम रखे हैं?
ये इतने लोग कहाँ जाते हैं सुबह-सुबह
इस साल न हो पुर-नम आँखें
... विदा लाडो
Details of Book :-
Particulars | Details (Size, Writer, Dialect, Pages) |
|---|---|
| Name of Book: | फिर मेरी याद | Phir Meri Yaad |
| Author: | Kumar Vishwas |
| Total pages: | 120 |
| Language: | हिंदी | Hindi |
| Size: | 8.3 ~ MB |
| Download Status: | Available |
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