Free Hindi Book Safar Jo Pichhe Chhut Gaya In Pdf Download
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पुस्तक का संक्षिप्त विवरण:
15 April 2001
इन्हें जल्दी से हस्पताल ले चलो.. भीड़ में से एक आवाज़ आती है.. खून से लथपथ एक आदमी सड़क पर पड़ा है.. बड़ी तेज़ टक्कर मारी है ट्रक वाले ने इनकी गाड़ी में.. पता नहीं ये आदमी बचेगा भी या नहीं.. अरे भाई इनकी ज़ेब में चेक करो हो सकता है कुछ नाम पता मिल जाए..
एक आदमी जेब टटोलता है, जिसमें ये कार्ड मिलता है: SS Industries Director:
जय सक्सेना, फ़ोन: 011-566*****
कुछ लोग मिल कर जय को दिल्ली के सफदरजंग हस्पताल में भर्ती करवा देते है और हॉस्पिटल से डॉक्टर उस कार्ड पर दिए नम्बर पर फोन कर के जय के बारे में बताते है..
जय की माँः क्या हुआ मेरे बेटे को.. डॉक्टर साहब वो ठीक तो है ना..
डॉक्टर: माता जी आप चिंता मत करो सब ठीक है। सर पर गहरी चोट है उसके लिए हम उनका ऑपरेशन कर रहे है। पास में खड़ा जय का बेटा समीर और जय की पत्नी स्नेहाः क्या कहा.?? ऑपरेशन?? डॉक्टर साहब वो ठीक तो हो जाएँगे ना..?
डॉक्टर: आप अभी इंतज़ार कीजिए.. ऑपरेशन के बाद ही कुछ पता चल पाएगा...
३ घंटे बादः
ऑपरेशन थीयटर की लाइट ऑफ़ होती है.. डॉक्टर बाहर आते है.. समीर भाग कर डॉक्टर के पास जाता है.. क्या हुआ डॉक्टर साहब, मेरे पापा ठीक है ना..??
डॉक्टर: सर पर गहरी चोट की वजह से वो कोमा में है। शायद अब कभी बोल भी नहीं बोल पाएँगे। उनकी याददाश्त भी अब यही रुक जाएगी। हमें माफ़ कीजिएगा।
जय की माँ डॉक्टर के ये शब्द सुनते ही बिलख-बिलख कर रोती है। समीर डॉक्टर की बातों से समझ गया था की अब उसके पापा एक बस ज़िंदा लहाश की तरह है जिनकी बस साँसे चल रही है।
ऐसे ही कुछ दिन बीत जाते है.. समीर के दिमाग़ में एक दम से वो जीवन बीमा पॉलिसी घूमती है जो जय ने अभी कुछ दिन पहले ही करवाई थी.. नहीं वो तो बीमा वाले ने कहा था की मरने के बाद ही मिलेंगे।
समीरः माँ तुम्हें याद है पापा के नाम पर एक जीवन बीमा पॉलिसी है.
स्नेहाः हाँ याद है। क्यों क्या क्या हुआ?
समीरः उसमें आप ही नॉमिनी है ना?
स्नेहाः हाँ। तो?
समीरः अगर पापा मर गए तो सोचा है तुम्हें कितने पैसे मिलेंगे?
स्नेहाः तुझे शर्म नहीं आती ऐसा सोचते हुए। पापा है वो तेरे
समीरः शर्म कैसी माँ। देखो मेरा एक जानपहचान का डॉक्टर है जयपुर में. हम पापा को वहा भर्ती कर देते है.. कुछ दिनो बाद यहाँ सबको बोल देंगे की उनकी मृत्यु हो गयी.. मेरी डॉक्टर से बात भी हो गयी है.. वो हमें मृत्यु प्रमाण पत्र भी बना कर दे देगा.. वैसे भी तो दिल्ली के डॉक्टर ने बोला ही है की वो अब ठीक नहीं होंगे.. तो बीमा कम्पनी से झूठ बोल कर पैसे लेने में क्या दिक्कत है।।
स्नेहाः कुछ सोचते हुए। हाँ वैसे तो तू सही कह रहा है। घर में कौन उनकी सेवा करेगा? और पैसे मिल ही रहे है तो क्या समस्या है?
जय की बूढ़ी माँ पीछे खड़ी चुपके से सब सुन रही है.. मेरे होते हुए कभी ऐसा नहीं हो सकता.. समीर को एक तमाचा मारते हुए.. तुम्हें शर्म भी नहीं आती.. जो इंसान तुम्हारे ऊपर अपनी जान देता है उसके बारे में तुम पैसों के चक्कर में ऐसा सोच रहे हो।
समीरः मैं जानता था ये बुढ़िया ज़रूर बीच में आएगी.. पर आज के बाद नहीं.. समीर सोफ़े से तकिया उठा कर अपनी ही दादी का दम घोट के मार देता है.. स्नेहा पास में खड़े सब देख रही है.. पर पैसों की बात में इतना खो जाती है की समीर का ये सब करना भी उसे सही लगता है..
कुछ दिनो बादः
समीर और स्नेहा दोनो मिल कर जय को जयपुर के सरकारी हस्पताल में भर्ती करवा देते है.. और डॉक्टर के साथ मिल कर उसका मृत्यु प्रमाण पत्र ले लेते है डॉक्टर से...
समीरः डॉक्टर तुम्हारे पैसे तुम्हारे घर पहुँच जाएँगे। और तुम चाहो तो मेरे पिता को यही कभी भी ज़हर दे कर सच में भी मार सकते हो.. यही सब क्रिया करवा देना पर हमें फ़ोन मत करना। कभी सपने में भी जय की पत्नी और बेटे ने नहीं सोचा था कि जय फिर से उनकी ज़िन्दगी में आएगा.. 18 सालों बाद जय अपनी आँखे खोलता है...
Details of Book :-
Particulars | Details (Size, Writer, Dialect, Pages) |
|---|---|
| Name of Book: | सफ़र जो पीछे छूट गया | Safar Jo Pichhe Chhut Gaya |
| Author: | Dhiraj Verma |
| Total pages: | 50 |
| Language: | हिंदी | Hindi |
| Size: | 6.3 ~ MB |
| Download Status: | Available |
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