Free Hindi Book Mantra Vigyan Se Aage In Pdf Download
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पुस्तक का संक्षिप्त विवरण:
मंत्र-साधनाः एक वैज्ञानिक प्रक्रिया
मंत्र-सिद्ध मांत्रिक द्वारा समुचित मंत्र प्रक्रिया अपनाकर और मंत्रोच्चारण करके आसमान साफ और निर्मंघ होते हुए भी वर्षा कराना, कोई भी ज्वलनशील पदार्थ न होने पर भी अग्नि प्रज्वलित करना और शांत व सौम्य वातावरण में भी एकाएक तीव्र वायु प्रवाहित करके आंधी-तूफान की स्थिति उत्पन्न करना वैज्ञानिक प्रयोगों की भांति पूर्णतया प्रायोगिक कार्य हैं।
मानव चूंकि सदैव से ही जिज्ञासु और चमत्कारिक आविष्कारों की ओर आकृष्ट रहा है, इसी कारण मंत्र विज्ञान उसकी इस प्रवृत्ति को पोषण देने में काफी सहायक सिद्ध होता है। किसी दैवीय माध्यम से असंभव को संभव होते देखना मानव को रोमांचित करता है।
'मं म दैवीय शक्तियों को सिद्ध करने, उन्हें प्रसन्न करने और उनकी त्र विज्ञान' विज्ञान की एक ऐसी शाखा है जिसके अंतर्गत मनुष्य कृपा प्राप्त करने के प्रयत्न करता है। 'मंत्र' को हम शब्द विज्ञान या ध्वनि विज्ञान का एक प्रकरण भी कह सकते हैं। 'शब्द' इस ब्रह्मांड का प्रथम बीज है जिसके उद्घाटित होने से ही सृष्टि का सृजन और संचालन आरंभहुआ। यह प्रथम बीज शब्द 'ॐ' है।
खगोलीय वैज्ञानिकों ने भी निसंदेह यह सिद्ध किया है कि ब्रह्मांड के केंद्र से एक विशिष्ट नाद सतत् उच्चारित होता रहता है, जो अ, उ. म तथा अनुस्वार के बिंदु के संयुक्त स्वरूप 'ॐ' अर्थात् 'ओंकार' के रूप में सुनाई देता है। इसी शब्द या ध्वनि के विशिष्ट विन्यास, संयोजन और लयबद्ध उच्चारण से मंत्र की उत्पत्ति हुई।
ध्वनि से ही सभी स्वरों और व्यंजनों की उत्पत्ति हुई और प्रत्येक स्वर व व्यंजन की अपनी-अपनी पृथक-पृथक शक्तियां होती हैं और इनके उच्चारण से भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रभाव उत्पन्न होते हैं।
प्रत्येक स्वर और व्यंजन अपने गुण, स्वभाव और धर्म के अनुसार सर्वथा भिन्न होता है। स्वर और व्यंजन का मिश्रण भिन्न-भिन्न प्रयोग से भिन्न-भिन्न अर्थ प्रदान करता है।
प्रत्येक स्वर और व्यंजन परस्पर मिलकर नवीन भाव और अर्थ की उत्पत्ति करते हैं। लिपि और भाषा कोई भी हो, स्वर और व्यंजन का संबंध यही होता है। हम परस्पर वार्तालाप करते हैं तो स्वर व व्यंजन के संयोग से ही करते हैं। यदि स्वर और व्यंजन उचित संयोजन में न हों तो वार्तालाप अर्थहीन हो जाता है। हम नमस्ते को नमस्ता और सगर को सागर नहीं कह सकते अर्थात् मानव जीवन में शब्द की अनिवार्यता है। वास्तव में शब्द ही सृष्टि का आधार है।
हमारे ऋषि-मुनियों और विषय-विशारदों ने शब्द की महत्ता को स्वीकार करके अनेक चिंतन-मनन और शोधों के पश्चात् यह जाना कि प्रत्येक शब्द में निहित स्वर व व्यंजन का भिन्न स्वामी या देवता होता है और वह स्वामी या देवता अपने-अपने शब्द की स्तुति से प्रसन्न होता है। जो स्तुति करता है, उसे यह स्वामी या देवता उसका मनोवांछित फल प्रदान करने में किंचित पीछे नहीं रहता। बस इस स्तुति की कुछ आवश्यक शर्ते होती हैं, जिनका पूर्णरूपेण पालन करने वाला साधक उस देवता का कृपापात्र हो जाता है। वास्तव में इसी स्तुति के शब्द संयोजन को मंत्र कहा जाता है।
मंत्र प्राचीन काल से ही जन-जीवन का अभिन्न अंग रहे हैं। ऋषि-मुनियों ने जन-कल्याण की भावना से अद्भुत मंत्र विज्ञान की रचना की। गुरु-शिष्य परंपरा के द्वारा यह विज्ञान अपने आरंभ काल में तो मौखिक ही थी, फिर इसे लिखित रूप में सहेजा गया और कालांतर में यह ग्रंथों के रूप में सुलभ हुई।
सूर्य, वायु, अग्नि, वरुण आदि सभी देवता अपनी-अपनी शब्द स्तुति से प्रसन्न होते हैं, इसी विज्ञान और आस्था से मंत्रों की रचना हुई। हम वेदों, उपनिषदों और........
Details of Book :-
Particulars | Details (Size, Writer, Dialect, Pages) |
|---|---|
| Name of Book: | मंत्र विज्ञान से आगे | Mantra Vigyan Se Aage |
| Author: | Yogiraj Rameshji Maharaj |
| Total pages: | 182 |
| Language: | हिंदी | Hindi |
| Size: | 46 ~ MB |
| Download Status: | Available |
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