Free Hindi Book Kambakht Tere Pyaar Mei In Pdf Download
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पुस्तक का संक्षिप्त विवरण:
'जिंदगी के नाम' दस्तावेज़ हो और उस पर मौत ने दस्तखत कर रखे हो, तो उसे खतरनाक दस्तावेज़ ही कहा जाएगा। ऐसा एक दस्तावेज़ मुझे पिछले दिनों एक शख्स देकर चला गया। दस्तावेज़ ग़ज़ल संग्रह की शक्ल में था।
कमबख्त तेरे प्यार में" जी हां, यही नाम है जिंदगी के नाम लिखे इस दस्तावेज़ का । दस्तावेज़ के एक पन्ने पर नरेश मधुकर का नाम भी लिखा है। इस दस्तावेज़ से गुजरते हुए यह तय पाया की गज़लों का यह गुलदस्ता भले ही जंगली फूलों से से सजाया गया हो मगर खूबसूरत हैं। गमले में लगे फूलों से जंगल के फूल फूल जुदा होते हैं। माली नहीं मालिक परवरिश करता है उनकी। मौसमों से लड़ने वाले फूल के गुलदस्ते अनुशासित भले ही ना हो, मगर होते बहुत खूबसूरत है।
नरेश राघानी उर्फ नरेश मधुकर ने गज़लें कहना कब से शुरू किया? यह मुझे नहीं पता । मगर उसके अंदर छिपे कवि को मैं बहुत पहले से जानता हूं। शायद तब से जब वह जिंदगी की उलझन को सुलझाने कि जद्दोजहद में लगा हुआ था।
नरेश मधुकर में ग़ज़ल के प्रति रुझान कैसे हुआ? उसका परिवार तो जूते के कारोबार से जुड़ा था। यह कारोबार फूलों के कारोबार में कब तब्दील हो गया ?
फेसबुक पर नरेश मधुकर को मैं पढ़ता रहा हूं। मुझे उसकी कविताओं ने कभी प्रभावित नहीं किया था। भावनाओं के उद्वेग से ज्यादा कुछ भी नहीं नजर आता था। लेकिन इस बार जब उसके ग़ज़ल संग्रह की पांडुलिपि देखी तो पिछली बनी हुई धारणा थोड़ी ठिठक गई। नरेश की गज़लों में तथ्य को खोजा जाए तो निश्चित रूप से उसकी गज़लें कामयाब है । विषयों के अंतर को नरेश समझता है। सोच के स्तर पर वह पूरी तरह परिपक्व नजर आता है। शब्दों के प्रति उसकी जिम्मेदारी पढ़ने वालों को प्रभावित करने वाली है। नरेश के अंदर का शायर संघर्षों से पैदा हुआ है। नरेश आग से लड़ते हुए हमेशा पानी से दूर रहा । समझौता करना क्योंकि उसके स्वभाव में नहीं रहा, इसलिए गज़लों के बादशाहों से भी उसने कोई समझौता नहीं किया खुद्दारी की दृष्टि से उसके जज्बे को में पूरा सम्मान देता हूं। मगर अदब की दुनिया में यह विचार मान्य नहीं होते। भावनाओं से भले समझौता न भी हो लेकिन शब्दों के समझौते तो करने ही पढ़ते हैं। और फिर ग़ज़ल ऐसी विधा है, जो पैदा ही अनुशासन से होती है।
ग़ज़ल की भाषा पर मैंने कभी कुछ नहीं कहा, उर्दू, हिंदी, गुजराती, पंजाबी, सिंधी किसी भी भाषा की ग़ज़ल से मेरी मुलाकात हुई मैंने हमेशा उसकी पहचान गज़लीयत से ही की है। भाषा के नाम पर ग़ज़ल को कभी उरूज़ के लिए रियायत नहीं दी जा सकती । यदि गुलाब बोना है तो सारी परिस्थितियों और परवरिश कि जरूरत है। मौसम, मिट्टी, पानी, हवा, सब उसके मुताबिक ही देना होगा। दूसरी तरफ यदि गुलाब की जगह कैक्टस उगाये जा रहे हो तब सब कुछ बदल जाएगा। इसी तरह यदि कोई कहता है कि मैं ग़ज़ल में ग़ज़ल की व्याकरण को नहीं मानता, सिर्फ कैक्टस को तरजीह देता हूं। तो उसे सलाह दूंगा कि वह अतुकांत कविता लिखें। ग़ज़ल में इस तरह की छूट नहीं मिल सकती। इसलिए आपको विधि विधान से ही ग़ज़ल की सारी मर्यादा निभानी होगी।
यहां आपको बताऊं कि शुरुआती दौर में मुझे भी जब ग़ज़ल कहने का शौक चढ़ा। तो मैंने बिना सुध बुध के सोचे समझे गज़लें कहना शुरू कर दी। नतीजा यह हुआ कि जब पहले ग़ज़ल संग्रह "दर्द बे अन्दाज़" आया तो उस्ताद शायरों ने उसे बुरी तरह से उड़ा दिया । अपने अपमान को मैंने अपना उस्ताद बना लिया। कड़ी मेहनत की, बड़े-बड़े उस्ताद शायरों की सेवा में जाकर ग़ज़ल की बुनियादी जरूरत को समझा। जब उस्तादों से सीख कर ग़ज़ल का बाकायदा अध्ययन किया, तो पता चला कि मेरा पहला ग़ज़ल संग्रह सही मायने में ग़ज़ल संग्रह था ही नहीं। नरेश मधुकर भी इन दोनों गज़लों की नब्ज़ पर हाथ रख रहे हैं । उनका मौजूदा ग़ज़ल संग्रह शायद उतना कामयाब ना हो, मगर उनमें जो लगन और जो नशा मैंने देखा है, उसके मद्देनज़र अगला संग्रह बेहद कामयाब होगा ।
नरेश मधुकर की गज़लों में सिर्फ उरूज़ की कमी गिनाई जा सकती है। बाकी तो प्रयोग और विषय वस्तु की दृष्टि से गज़लें एकदम दुरुस्त है। उनका शब्द चयन बेहद धारदार है। उनके शेर चौकाते भी हैं। कई बार तो मन वाह वाह कर उठता है। बड़ी मेहनत से उन्होंने संग्रह को तैयार किया है। मेरा आग्रह है कि ऐसे लोग जो ग़ज़ल विधा के जानकार है, वह नरेश मधुकर की गज़लों को बेरहम नक्कार की निगाह से ना देखें। तालीमी शायर की निगाह से देखें। नरेश मधुकर बहुत ही जिम्मेदार शायर है। मुझे यकीन है कि उनका प्रकाशित होने वाला ग़ज़ल संग्रह "क़म्बख्त तेरे प्यार में" नए शायरों के लिए प्रेरणा दाई होगा। पिछले दिनों नरेश से बात हुई। तब उन्होंने बताया कि वह ग़ज़ल के उरूज़ पर ज्ञान......
Details of Book :-
Particulars | Details (Size, Writer, Dialect, Pages) |
|---|---|
| Name of Book: | कमबख्त तेरे प्यार में | Kambakht Tere Pyaar Mei |
| Author: | Naresh Raghani Madhukar |
| Total pages: | 113 |
| Language: | हिंदी | Hindi |
| Size: | 9 ~ MB |
| Download Status: | Available |
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