बहुत दूर, कितना दूर होता है | BAHUT DOOR, KITNA DOOR HOTA HAI HINDI BOOK PDF FREE DOWNLOAD

Bahut Door Kitna Door Hota Hai Hindi Book Pdf Free Download

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पुस्तक का संक्षिप्त विवरण:

यह बहुत पुरानी बात है, जब बंटी कुएँ की मुँडेर पर बैठे हुए अपनी दोपहरें काटा करता था। उन्हीं दोपहरों में अपनी चाय की दुकान छोड़कर, उसका पक्का दोस्त सलीम भी उसकी बग़ल में आकर बैठ जाता था। दोनों की उम्र लगभग सात या आठ साल होगी। हर दोपहर गाँव के ऊपर से एकमात्र हवाई जहाज़, तेज़ आवाज़ करता हुआ उनके आसमान से गुज़र जाया करता था। सलीम की आदत थी कि वो कुएँ की मुँडेर पर खड़ा होकर हवाई जहाज़ को टाटा किया करता था और बंटी की आदत थी कि वो उस हवाई जहाज़ का अक्स अपने कुएँ के पानी में देखा करता था।

पर आज के दिन इंतज़ार कुछ लंबा था।

"यार बंटी, अबे बहुत ही ज्यादा टेम हो गया। आज तो आसमान भी चकाचक चमक रिया है।" सलीम ने अपनी मैली क़मीज़ से पसीना पोंछते हुए कहा।

"अबे थोड़ा घूमकर आ रिया होगा।"

"अभी तक तो आवाज भी नई आरी उसकी... आवाज तो आ जानी चईये अब तक।"

इस बात का बंटी ने कोई जवाब नहीं दिया। वो पहली बार हवाई जहाज़ का इंतज़ार नहीं कर रहा था। उसके दिमाग़ में कुछ वक़्त से एक सवाल चल रहा था।

"सलीम, ये जहाज आता कहाँ से है? और ये रोज जाता कहाँ है?"

"पीछे से आता है, बहुत दूर से... और फिर आगे तो बहुत ही दूर चला जाता है।"

"किधर?"

"अबे बहुत दूर!"

"बहुत दूर, कितना दूर होता है?"

दोनों इस सवाल पर चुप हो गए। सलीम, कुएँ की मुँडेर पर खड़ा हो गया और कुछ देर कान लगाकर सुनने लगा। उसे लगा कि हवाई जहाज़ की आवाज़ है पर वो पीछे जोशी जी के ट्रैक्टर की आवाज़ थी। वह वापिस बंटी की बग़ल में बैठ गया।

"आज तो भटक गया लगता है।" सलीम ने साँस छोड़ते हुए कहा।

"अगर हम रफीक मियाँ की दुकान से साइकिल किराये पर लें और हाईजाज के पीछे

भगा दें तो हम भी क्या बहुत दूर चले जाएँगे?"

"तुझे साइकिल चलाना कां आता है!"

"अबे बस पूछ रिया हूँ।"

सलीम और इंतज़ार नहीं कर पाया। उसकी चाय की दुकान पर ग्राहकों की भीड़ जमा हो गई होगी। अपनी चाय की दुकान की तरफ़ जाते हुए उसकी निगाह पूरे वक़्त आसमान पर ही थी। कुछ देर में बंटी ने भी इंतज़ार छोड़ दिया। हवाई जहाज़ से ज़्यादा उसे उसका सवाल कचोट रहा था। वह वहाँ से दौड़ता हुआ, बाज़ार के पीछे की तरफ़ से होता हुआ, जीवन की पतंग की दुकान पर चला गया।

दोपहर को जीवन की दुकान पर कम ही बच्चे आते थे। वह दोपहर को इत्मीनान से नमाज़ पढ़ता था और फिर अपनी दुकान पर लगे गणपती के सामने अगरबत्ती जलाता था। बंटी जीवन की कई दोपहरों का हिस्सा था सो उसे इस बात पर कोई आश्चर्य नहीं होता था। ऐसा कहते हैं कि जब जीवन के अब्बा को जीवन एक मज़ार पर पड़ा मिला था तब उसके गले में गणपती का लॉकेट लटक रहा था।

"आज तो वो आया नहीं..." बंटी ने गुप्त स्वर में बोला।

"कौन?" जीवन मांझा गिरी में लपेट रहा था।

"हाईजाज।"

"हाँ... आज सुनाई नहीं दिया।"

बंटी को हमेशा लगता था कि जीवन उसे बच्चा समझता है। और ये बात अभी तक सिर्फ़ उसके पक्के दोस्त सलीम को पता थी कि वो अब बच्चा नहीं रहा था। पिछली बार बंटी ने जीवन से कहा था कि एक बार वो नीली पतंग उड़ा रहा था, उस पतंग को आसमानी हवा लग गई थी और वो ऊपर की तरफ़ जाए जा रही थी... तभी जहाज़ निकला और उसने जैसे-तैसे अपनी पतंग को जहाज़ से बचाया था.. वरना वो जहाज़ में फँसकर उस दिन उड़ जाता।

जिस सवाल को लेकर बंटी जीवन के पास आया था उसने उस सवाल को झिड़क दिया।

"मैं बहुत दूर जाना चाहता हूँ।"

जीवन की गिरीं अचानक रुक गई। जीवन को लगा कि उसने कुछ ग़लत सुना है...

बंटी ने फिर कहा।

"मैं बहुत दूर जाना चाहता हूँ।"

"कितनी दूर?"

"बहुत दूर।"

Details of Book :-

Particulars

Details (Size, Writer, Dialect, Pages)

Name of Book:बहुत दूर, कितना दूर होता है | Bahut Door, Kitna Door Hota Hai
Author:Manab Koul
Total pages:113
Language: हिंदी | Hindi
Size:1.6 ~ MB
Download Status:Available


Bahut Door, Kitna Door Hota Hai written by Manab Koul | Ebook size 1.6 MB | Includes 113 Pages | Find the free PDF download link of “Bahut Door, Kitna Door Hota Hai” below and read it right away.

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