Free Hindi Book Islam Aur Nyay In Pdf Download
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पुस्तक का संक्षिप्त विवरण:
इस्लाम और न्याय
न्याय स्थापित करना और उस पर दृढ़ रहना सरकार एवं न्यायालय का ही कर्तव्य नहीं बल्कि प्रत्येक मनुष्य इसका बाध्य है
الْحَمْدُ لِلَّهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ وَالصَّلُوةُ وَالسَّلَامُ عَلَى سَيِّدِنَا مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِهِ وَأَصْحَابِهِ أَجْمَعِينَ.
इस्लाम एक आसमानी मज़हब है, जिसको ज़मीन और आसमान के पैदा करने वाले अल्लाह ने ज़मीन पर बसने वाले सभी प्राणियों के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार करने के लिये भेजा है, इसलिये इस्लाम के धार्मिक ग्रंथ कुरआन करीम में अल्लाह के सच्चे नबी हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के आदेशों में जगह जगह इसका निर्देश मिलता है।
अल्लाह ने कुरआन में फ्रमाया है:-
وَإِذَا حَكَمْتُمْ بَيْنَ النَّاسِ أَنْ تَحْكُمُوا بِالْعَدْلِ.
(سورة النساء : (۵۸)
"और जब लोगों का (चाहे वो किसी भी धर्म के मानने वाले हों) समझौता (फैसला) किया करो तो न्याय से समझौता किया करो।" (सूरह-4, आयत-58)
उपरोक्त आयत में अल्लाह तआला ने "लोगों में समझौता किया करो" क्रमाया है, "मुसलमानों में समझौता किया करो" नहीं फ्रमाया, इसमें इशारा है कि मुकदमों के फैसलों में सभी मनुष्य समान हैं, मुस्लिम हों या गैर-मुस्लिम, दोस्त हों या दुश्मन, फैसला करने वालों पर अनिवार्य है कि इन सब सम्बंधों से अलग हो कर जो भी न्याय संगत हो वो फैसला करें। (मआरिफुल कुरआन 2/448)
इस आयत से मालूम हुआ कि जो फैसले न्याय के आधार पर नहीं बल्कि अपने और पराए पर आधारित होंगे वह इस्लामी शिक्षा के विरुद्ध और अत्याचार होंगे।
दूसरी जगह कुरआन में अल्लाह ने फ्रमाया कि:-
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا كُونُوا قَوَّامِينَ لِلَّهِ شُهَدَاءَ بِالْقِسْطِ وَلَا يَجْرِمَنَّكُمْ شَنَتَانُ قَوْمٍ عَلَى أَن لَّا تُعْدِلُوا اعْدِلُوا هُوَ أَقْرَبُ للتَّقْوى وَاتَّقُوا اللَّهَ إِنَّ اللَّهَ خَبِيرٌ بِمَا تَعْمَلُونَ
(سورة المائدة آيت (۸)
"ऐ ईमान वालो! अल्लाह तआला के लिये पूरी पाबंदी और न्याय के साथ गवाही देने वाले बनो और किसी विशेष समुदाय की शत्रुता तुम्हारे लिये इसका कारण न हो जाए कि तुम न्याय न करो, नयाय किया करो। (हर एक के साथ) कि वो तकवा (पवित्रता) से अधिक निकट है।"
(सूरत-5, आयत-8)
उपरोक्त आयत में स्पष्ट रूप से यह आदेश दिया गया है कि न्याय स्थापित करना और उस पर दृढ़ रहना सरकार और न्यायालय ही का कर्तव्य नहीं, बल्कि प्रत्येक मनुष्य इसका बाध्य है कि वह स्वयं भी न्याय पर डटा रहे और दूसरों को भी न्याय पर डटे रहने का प्रयास करे। (मआरिफुल कुरआन 2/572)
Details of Book :-
Particulars | Details (Size, Writer, Dialect, Pages) |
|---|---|
| Name of Book: | इस्लाम और न्याय | Islam Aur Nyay |
| Author: | Maulana Arshad Madani |
| Total pages: | 8 |
| Language: | हिंदी | Hindi |
| Size: | 2.9 ~ MB |
| Download Status: | Available |
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