आत्मविश्वास आपकी जीत | ATMVISWAS APKI JEET HINDI BOOK PDF FREE DOWNLOAD

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पुस्तक का संक्षिप्त विवरण:

कर्मशील मनुष्य की ही सब जगह पूछ है। अकर्मण्य की कहीं भी पूछ नहीं। परमेश्वर दीन का भी साथी है, मूर्ख का भी साथी है, पापी का भी साथी है; पर वह अकर्मण्य का साथी नहीं है।

मनुष्य स्वयं अपने भाग्य का निर्माता है, भगवान नहीं! हर बुरी बात के लिए या किसी प्रकार का संकट आ जाने पर उसके लिए भगवान को दोषी ठहराना हमारी आदत बन गई है, जो एकदम गलत बात है। भगवान यानी परमात्मा तो रोग और द्वेष से रहित है। वह न किसी को सुख देता है और न दुःख। यह हमारे कर्म हैं जो सुख और दुःख देते रहते हैं और जिनका फल हमें भोगना पड़ता है। मुनि विद्यानंद ने कहा है, "कर्म बहुत बलवान है, वही भाग्य का विधाता है। मनुष्य जैसा कर्म करता है; वैसा ही उसका भाग्य बनता है। अपने पुरुषार्थ, अपने कर्म और अपने द्वारा किए जाने वाले कार्य के द्वारा मनुष्य अपने भाग्य को भी बदल सकता है।"

डॉक्टर कैलाशनाथ काटजू जब केंद्र में गृहमंत्री थे तो उन्होंने एक बार कहा, "मुझे एक घटना याद आती है। एक नियुक्ति के सिलसिले में इन्टरव्यू चल रहा था। एक नवयुवक की बारी आई। अभी वह कमरे में घुस ही पाया था कि उससे पूछा गया, अपनी नौकरी के लिए तो तुमने अर्जी दे दी है, लेकिन क्या तुम्हारे पास किसी की सिफारिश है ?"

इस पर उस नवयुवक ने तुरंत ही पहले अपनी बलिष्ठ भुजदंडों पर, फिर अपनी जंघाओं पर हाथ मारा, थपथपाया और सीना तानते हुए गंभीर वाणी में बोला, "जी हां साहब! मेरी सिफारिश ये हैं। मैं अपनी शक्ति पर विश्वास करता हूं। मुझे अपनी योग्यता और कार्यक्षमता पर पूरा भरोसा है। अगर श्रीमान को यह सिफारिश पसंद हो, तो आप मुझे नौकर रख सकते हैं?"

डॉक्टर काटजू के कहने का आशय यह है, "मैंने उस नवयुवक को उस पद पर नियुक्त कर दिया। आज के नवयुवक को इसी तरह के आत्मविश्वास की आवश्यकता है।"

सोलह वर्षीय राजगोपाल थियोसोफिकल कॉलेज (मसास) का विद्यार्थी था। उसका व्यक्तित्व बड़ा मोहक था। उसने प्रतिदिन दो घंटे ग्रामीणों की सेवा में लगाने का निश्चय किया और एक संध्या वह ग्रामीण बंधुओं से मिलने निकल पड़ा।

ग्रामीणों को एकत्र कर उसने पूछा, "यदि मैं आपको पढ़ाना चाहूं तो आप लोग पढ़ने के लिए तैयार हैं?"

यह सुनकर ग्रामीणों के चेहरे प्रसन्नता से खिल उठे। युवक राजगोपाल ने एक टूटे-फूटे छप्पर के नीचे पाठशाला आरंभ कर दी। अगले दिन उसने कॉलेज के अध्यक्ष श्री जिनराज दास की सहायता से लालटेन, कागज, पेंसिल, स्लेट और पुस्तक की व्यवस्था की। कॉलेज के दो साथी भी इस जनसेवा कार्य में सम्मिलित हो गए। इस युवक-मंडली ने छह महीने तक रात्रि पाठशाला चलाई। उनके प्रयासों से गांव में एक अद्भुत परिवर्तन आ गया।

राजगोपाल की इस सफलता ने उसे समीप के अन्य गांवों में भी ऐसी ही पाठशालाएं चलाने को प्रोत्साहित किया। उसने 'रात्रि पाठशाला समिति' की स्थापना की। उसमें कई और विद्यार्थी सहयोगी हो गए और शीघ्र ही दो अन्य पाठशालाएं भी प्रारंभ हो गईं।

पाठशालाओं को सुचारु रूप से चलता देखकर उनके लिए एक भवन बनाने की इच्छा राजगोपाल के मन में जागी। इसके लिए उसे बम्बई (मुंबई) जाना पड़ा। उसने वहां थियोसोफिकल सोसाइटी के नेताओं के समक्ष अपनी योजना प्रस्तुत की।

यह राजगोपाल का आत्मविश्वास ही था कि योजनानुसार भवन के लिए आवश्यक धन मिल गया और इस तरह गांवों में स्कूलों के भवन तैयार हो गए। आज भी इन भवनों में बेसेंट पाठशाला, अरुण्डेल पाठशाला और जिनराज दास पाठशाला चल रही हैं।

राजगोपाल के मन में जो विचार उत्पन्न हुआ, उसे कार्यरूप देने में उसका आत्मविश्वास ही अधिक सहायक हुआ। यही राजगोपाल आगे चलकर 'चक्रवर्ती राजगोपालाचार्य' के नाम से विश्वविख्यात हुआ।

राजगोपाल की भांति आपका अपनी कार्य-शक्ति में कितना विश्वास है ? जो कार्य आप करना चाहते हैं, उसके लिए आप अपने को कितना योग्य समझते हैं ?

'आप अपना कार्य अच्छी तरह समझ-बूझ कर करते हैं,' ऐसा अपने निकटतम मित्रों, संबंधियों, पत्नी और बच्चों से कहते हुए आप तनिक भी नहीं सकुचाते, लेकिन आप अपने को यह विश्वास दिलाने में कभी सफल नहीं होते कि जिस कार्य को आपने अपने हाथों में लिया हुआ है, आप उसके सर्वथा योग्य हैं। अनेक लोगों को यह दुःख सालता रहता है कि क्या अच्छा होता यदि वे इतने योग्य होते, जितना लोग उन्हें समझते हैं। एक ऐसे ही व्यक्ति से जब यह पूछा गया कि आप उतने योग्य क्यों नहीं हैं, तो वे कहते हैं कि इस प्रश्न का उत्तर उनके पास नहीं है।

Details of Book :-

Particulars

Details (Size, Writer, Dialect, Pages)

Name of Book:आत्मविश्वास आपकी जीत | Atmviswas Apki Jeet
Author:Swett Marden
Total pages:228
Language: हिंदी | Hindi
Size:66.6 ~ MB
Download Status:Available


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