बिराज बहू | BIRAJ BAHU HINDI FREE BOOK PDF DOWNLOAD

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पुस्तक का संक्षिप्त विवरण:

नीलाम्बर और पीताम्बर नाम के दो भाई हुगली जिले के सप्तग्राम में रहते थे। मुर्दे जलाने, कीर्तन करने, ढोल बजाने और गांजा पीने में नीलाम्बर जैसा आदमी उस ओर और कोई नहीं था। उसके लम्बे और गोरे बदन में असाधारण शक्ति थी। परोपकार के लिए वह गांव में जितना विख्यात था, अपने गंवारूपन के लिए भी उतना ही कुख्यात था। लेकिन छोटा भाई एकदम दूसरी तरह का आदमी था। दुबला-पतला और ठिगने कद का। किसी के घर मरने की खबर सुनते ही शाम के बाद उसका शरीर कुछ विचित्र-सा होने लगता था। वह अपने बड़े भाई जैसा मूर्ख नहीं था और न गंवारूपन को अपने पास फटकने देता था। तड़के ही खा-पीकर बगल में बस्ता दबाकर घर से निकल पड़ता और हुगली की कचहरी के पश्चिम की ओर आम के एक पेड़ के नीचे आसन जमा देता। दरख्वास्तें लिखकर दिनभर में जो कुछ कमाता उसे शाम होते ही घर आकर बक्स में बन्द कर देता। रात को कई बार उसकी जांच करके ही सोता था।

चंडी मंडप के एक ओर नीलाम्बर सबेरे के समय तम्बाकू पी रहा था। उसी समय उसकी अविवाहित बहिन धीरे से आकर उसके पीछे घुटने टेककर बैठ गई और उसकी पीठ में मुंह छिपाकर रोने लगी। नीलाम्बर ने हुक्का दीवार के सहारे रख दिया और एक हाथ अनुमान से बहिन के सिर पर प्यार से रखकर कहा, "सबेरे सबेरे क्यों रो रही है बहिन ?"

हरिमती ने मुंह रगड़कर भाई की पीठ पर आंसू पोंछकर कहा, "भाभी ने मेरे गाल मल दिए और होनी कहकर गाली दी है।"

नीलाम्बर हंसने लगा, "वाह, कानी कहती है। ऐसी सुन्दर दो आंखें रहने पर भी जो कानी कहे, वही कानी है। लेकिन तुम्हारा गाल क्यों मला?"

हरिमती ने रोते-रोते कहा, "ऐसे ही।"

"ऐसे ही? चलो पूहूं तो," कहकर हरिमती का हाथ पकड़कर नीलाम्बर अन्दर पहुंचे और पुकारा, "बिराज बहू!"

बड़ी बहू का नाम है ब्रजरानी। नौ वर्ष की उम्र में ही उसका विवाह हो गया था। तब से सभी उसे बिराज बहू कहते हैं। अब उसकी उम्र उन्नीस वर्ष की होगी। सास के मरने के बाद से वही घर की, मालकिन है। ब्रजरानी बहुत ही सुन्दर है। चार-पांच वर्ष पहले एक लड़का हुआ था जो दो-चार दिन बाद ही मर गया। उसके बाद कोई बच्चा नहीं हुआ। वह रसोई बना रही थी। पति की आवाज सुनकर बाहर निकली और भाई-बहिन को एक साथ देखकर भड़क उठी, बोली, "मुंह झाँसी, उलटे शिकायत करने गई थी ?"

नीलाम्बर ने कहा, "क्यों न करे? तुमने झूठ मूठ ही उसे कानी कह दिया, पर इसका गाल क्यों मला ?"

बिराज ने कहा, "इतनी बड़ी हो गई और सोकर उठी तो न मुंह धोया, न कपड़े बदले और जाकर बछड़ा खोल दिया और मुंह बाए खड़ी खड़ी देखती रही। एक बूंद भी दूध आज नहीं मिला। इसने तो मार खाने का काम किया है।"

नीलाम्बर ने कहा, "दूध लाने के लिए दासी को भेज देना चाहिए। अच्छा बहिन, तुमने बछड़ा क्यों खोला ? यह तो तुम्हारा काम नहीं है।" भाई के पीछे खड़ी हरिमती ने धीरे से कहा, "मैंने समझा कि दूध दुहा जा चुका है।"

"फिर कभी ऐसा समझा तो ठीक कर दूंगी," कहकर बिराज बहू चौके में जाने लगी तो नीलाम्बर ने हंसते हुए कहा, "इस उम्र में एक दिन तुमने भी मां का पालतू तोता उड़ा दिया था । यह समझकर कि पिंजड़े का तोता उड़ नहीं सकता, तुमने पिंजड़े की खिड़की खोल दी थी । याद है न ?

Details of Book :-

Particulars

Details (Size, Writer, Dialect, Pages)

Name of Book:बिराज बहू | Biraj Bahu
Author:Sarat Chandra Chattopadhyay
Total pages:190
Language: हिंदी | Hindi
Size:1.3 ~ MB
Download Status:Available


Biraj Bahu written by Sarat Chandra Chattopadhyay | Ebook size 1.3 MB | Includes 190 Pages | Find the free PDF download link of “Biraj Bahu” below and read it right away.

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