Free Hindi Book Andhere Band Kamre In Pdf Download
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पुस्तक का संक्षिप्त विवरण:
नौ साल में चेहरे काफी बदल जाते हैं; और कोई-कोई चेहरा तो इतना बदल जाता है कि पहले के चेहरे के साथ उसकी कोई समानता ही नहीं रहती।
मैं नौ साल के बाद दिल्ली आया, तो मुझे महसूस हुआ जैसे मेरे लिए यह एक बिल्कुल नया और अपरिचित शहर हो। जिन लोगों के साथ कभी मेरा रोज़ का उठना-बैठना था, उनमें से कई-एक तो अब बिल्कुल ही नहीं पहचाने जाते थे; उनके नयन-नक्श वही थे, मगर उनके चेहरे के आसपास की हवा बिल्कुल और हो गयी थी। हम लोग कभी आमने-सामने पड़ जाते, तो हल्की-सी ‘हलो-हलो’ के बाद एक-दूसरे के पास से निकल जाते। और ‘हलो’ कहने में भी केवल होंठ ही हिलते थे, शब्द बाहर नहीं आते थे। कई बार मुझे लगता कि शायद मेरे चेहरे की हवा भी इस बीच इतनी बदल गयी है कि परिचय का सूत्र फिर से जोडऩे में दूसरे को भी मेरी तरह ही कठिनाई का अनुभव होता है।
हालाँकि कुछ लोग ऐसे भी थे जो काफ़ी खुलकर मिले और जिनसे काफ़ी खुलकर बातें हुई, मगर उनके पास बैठकर भी मुझे महसूस होता रहा कि हम लोगों के बीच कहीं एक लकीर है—बहुत पतली-सी लकीर, जिसे हम चाहकर भी पार नहीं कर पाते और उसके इधर-उधर से हाथ बढ़ाकर ही आपस में मिलते हैं। कहाँ क्या बदल गया है, यह ठीक से मेरी समझ में नहीं आता था, क्योंकि कुछ लोग तो ऐसे थे कि उनके चेहरे-मोहरे में ज़रा भी फ़र्क़ नहीं आया था। मेरे बाल कनपटियों के पास से सफ़ेद होने लगे थे, मगर उनके बाल अब भी उतने ही काले थे जितने नौ साल पहले, यहाँ तक कि कभी-कभी मुझे शक होता था कि वे सिर पर ख़िज़ाब तो नहीं लगाते। मगर उनके गालों की चमक भी वैसी ही थी और उनके ठहाकों की आवाज़ भी उसी तरह गूँजती थी, इसलिए मुझे मजबूरन सोचना पड़ता था कि ख़िज़ाबवाली बात भी गलत ही होनी चाहिए। फिर भी कई क्षण ऐसे आते थे जब वे परिचित चेहरे मुझे बहुत ही अपरिचित और बेगाने प्रतीत होते थे।
हरबंस को नौ साल के बाद मैंने पहली बार देखा; उसका चेहरा मुझे और चेहरों की बनिस्बत कहीं ज़्यादा बदला हुआ लगा। उसके गालों का मांस कुछ थलथला गया था जिससे वह अपनी उम्र से काफ़ी बड़ा लगने लगा था (उसे देखते ही पहला विचार मेरे दिमाग में यह आया कि क्या मैं भी अब उतना ही बड़ा लगने लगा हूँ?)। उसके सिर के बाल काफ़ी उड़ गये थे, जिससे उसे देखते ही सिलविक्रिन के विज्ञापन की याद हो आती थी। मैं उस समय सिन्धिया हाउस के स्टॉप पर बस से उतरा था और कॉफ़ी की एक प्याली पीने के इरादे से कॉफ़ी हाउस की तरफ़ जा रहा था। तभी पीछे से अपना नाम सुनकर मैं चौंक गया। पीछे मुडक़र देखते ही हरबंस पर नज़र पड़ी, तो मैं और भी चौंक गया। मुझे ज़रा भी आशा नहीं थी कि इस बार दिल्ली में उससे मुलाकात होगी। नौ साल पहले जब मैं यहाँ से गया था, तब से मेरे लिए वह विदेश में ही था। मैं सोचता था कि मेरे एक और दोस्त की तरह, जिसने पोलैंड की एक विधवा से शादी करके वहीं घर बसा लिया है, वह भी शायद बाहर ही कहीं बस-बसा गया होगा। जाने से पहले वह कहता भी यही था कि अब वह लौटकर इस देश में कभी नहीं आएगा।
“हरबंस, तुम?” मैं ठिठककर उसके लम्बे डीलडौल को देखता रह गया। वह हाथों में दो-एक पैकेट सँभाले बहुत उतावली में मेरी तरफ़ आ रहा था। उसकी चाल में वही पुरानी लचक थी जिससे मुझे उसका बदला हुआ चेहरा भी उस समय बदला हुआ नहीं लगा। मैंने अपना हाथ उसकी तरफ़ बढ़ाया, तो उसने मेरा हाथ नहीं पकड़ा, अपनी पैकेटवाली बाँह मेरे कन्धे पर रखकर मुझे अपने साथ सटा लिया।
“अरे, तुम यहाँ कैसे, मधुसूदन?” उसने कहा, “मैंने तो समझा था कि तुम अब बिल्कुल अख़बारनवीस ही हो गये हो और दिल्ली में तुम्हारा बिल्कुल आना-जाना नहीं होता। तीन साल में आज मैं पहली बार तुम्हें यहाँ देख रहा हूँ।”
हम लोग जनपथ के चौराहे पर खड़े थे और मैं बत्ती का रंग बदलने की राह देख रहा था। बत्ती का रंग बदलते ही मैंने उसकी बाँह पर हाथ रखकर कहा, “आओ, पहले सडक़ पार कर लें।”
मेरा यह सुझाव उसे अच्छा नहीं लगा, मगर उसने चुपचाप मेरे साथ सडक़ पार कर ली। सडक़ पार करते ही वह रुक गया जैसे कि अपनी सीमा से बहुत आगे चला आया हो।
“मैं एक तरह से नौ साल के बाद यहाँ आया हूँ।” मैंने कहा, “बीच में मैं दो-चार बार एक-एक दिन के लिए आया था, मगर वह आना तो न आने के बराबर ही था।”
मगर मुझे लगा कि उसने मेरी बात की तरफ़ ध्यान नहीं दिया। उसकी आँखें मेरे कन्धों के ऊपर से सडक़ के पार किसी चीज़ को खोज रही थीं।
“तुम बाहर से कब आये हो?” मैंने पूछा, “मैंने तो सोचा था कि तुम अब बाकी ज़िन्दगी लन्दन या पेरिस में ही कहीं काट दोगे। जाने से पहले तुम्हारा इरादा भी यही था।” यह कहते हुए मुझे सहसा नीलिमा के नाम लिखे उसके पत्रों की याद हो आयी, और मेरा मन एक विचित्र उत्सुकता से भर गया।
“मुझे आये तीन साल हो गये।” वह उसी तरह मोटरों और बसों की भीड़ में कुछ खोजता हुआ बोला, “बल्कि अब यह चौथा साल जा रहा है? मुझे किसी ने बताया था कि तुम लखनऊ के किसी दैनिक में हो। दैनिक का नाम भी उसने बताया था। मैंने एकाध बार सोचा भी कि तुम्हें चिट्ठी लिखूँ, मगर ऐसे ही आलस में बात रह गयी। तुम जानते हो चिट्ठियाँ लिखने के मामले में मैं कितना आलसी हूँ।”
मुझे फिर उन दिनों की याद हो आयी जब वह अभी बाहर गया ही था। उन दिनों भी क्या वह चिट्ठियाँ लिखने के बारे में ऐसी बात कह सकता था? मेरे होंठों पर मुस्कराहट की एक हल्की-सी लकीर आ गयी और मैंने कहा, “हो सकता है, मगर इसमें सिर्फ नीलिमा की बात तुम्हें छोड़ देनी चाहिए।”
वह इससे थोड़ा सकपका गया। सहसा उसके हाथ इस तरह हिले जैसे अपनी खोयी हुई चीज़ उसे भीड़ में नज़र आ गयी हो, मगर दूसरे ही क्षण उसके कन्धे ढीले हो गये और उसके चेहरे पर निराशा की लहरें खिंच गयीं।
“तुम किसी को ढूँढ़ रहे हो?” मैंने पूछा।
Details of Book :-
Particulars | Details (Size, Writer, Dialect, Pages) |
|---|---|
| Name of Book: | अंधेरे बंद कमरे | Andhere Band Kamre |
| Author: | Mohan Rakesh |
| Total pages: | 218 |
| Language: | हिंदी | Hindi |
| Size: | 6.9 ~ MB |
| Download Status: | Available |
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