Free Hindi Book Aaj Ki Bachat Kal Ki Sukh In Pdf Download
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पुस्तक का संक्षिप्त विवरण:
आडम्बर और झूठी शान के मकड़जाल ने बड़े-बड़े धनी राजा, नवाब और ठाकुरों को अपने शिकंजे में कसकर नेस्तनाबूद कर दिया। भारत के इतिहास के पन्नों पर हमें ऐसे सैकड़ों उदाहरण पढ़ने को मिल जाएंगे, जब किसी राजा, नवाब या ठाकुर ने दिखावै और झूठी मान-मर्यादा को कायम रखने के लिए बेतहाशा धन का अपव्यय किया और बुरी तरह कर्ज में डूब गया।
कर्ज वो बुरी आदत है जो बड़े से बड़े, अच्छे से अच्छे आदमी को भी ज्ञान शून्य करें तबाही के गर्भ में धकेल देता है। कर्ज में डूबा इन्सान जल बिन मछली के समान छटपटाते हुए दम तोड़ देता है। ऐसे लोग जो धन के आने पर उसका आदर नहीं करते, धन भी जल्द ही उनका साथ छोड़ देता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को मितव्ययिता की कला का ज्ञान होना चाहिए। जो सोच-समझकर धन को व्यय करते हैं और उसका कुछ अंश बुरे समय के लिए बचाकर संचय करते हैं, वे सदा सुखी रहते हैं।
"इन्सान को उतने ही पैर फैलाने चाहिए, जितनी उसकी चादर हो।" आज के मानव को इस कहावत का आदर्श अपने जीवन में उतार लेना चाहिए। क्योंकि बढ़ती हुई इच्छाओं और उनकी पूर्ति की लालसा से उत्तेजित मनुष्य में दृढ़ निश्चय और दृढ़ संकल्प की शक्ति क्षीण हो जाती है और वह अपनी जरूरतों के सामने आसानी से घुटने टेक देता है। वह आत्मसंयम का सिद्धान्त भूलकर दुनिया की चकाचौंध से अंधा हो अपना अस्तित्व खो देता है। अपनी किसी लालसा को 'ना' कहने की शक्ति उसमें नहीं रहती। दृढ़ आत्मशक्ति और संकल्प विहीन व्यक्ति उस वृक्ष की तरह होता है जिसकी जड़ें खोखली हो चुकी हैं, जो कभी भी गिर सकता है। व्यक्ति का इस प्रकार पतन, समाज की नजरों में नालायकी का नमूना बन जाता है। लोग उसे मूर्ख कहते हैं। जो लोग धन होने पर सदा उसके आसपास मंडराते थे, हमेशा उसके सामने हाथ फैलाए रहते थे, उससे दूर हो जाते हैं। उसका उपहास उड़ाते हैं। ऐसे व्यक्ति की मदद के लिए तब कोई भी आगे नहीं आता। 'ना' शब्द का मनुष्य के जीवन में बहुत महत्व है। इसलिए 'हां' करने से पहले इस 'ना' के अभिप्राय को जानना बहुत जरूरी है।
जो व्यक्ति 'ना' नहीं कर पाता, उसके विषय में प्रत्येक व्यक्ति यही कहता है- "वह सबका मित्र था, किन्तु वह अपना मित्र न बन पाया। वह अपना ही सबसे भयंकर शत्रु था। उसने अपने आर्थिक साधन शीघ्रता से अपने दोस्तों और उनकी जी हजूरी अर्थात चमचागीरी पर बेतहाशा खर्च कर डाले। फिर अपनी झूठी शान को बरकरार रखने के लिए कर्ज में डूब गया और अपने भोलेपन और मूर्खता के हाथों मारा गया।
उसका जीवन इस सिद्धान्त पर चलता रहा कि जो कोई भी कुछ कहे उसके लिए वही करना चाहिए। उसका हृदय प्रत्येक व्यक्ति के हृदय की धड़कन के साथ धड़कता रहा, वह दूसरों के दुख को अपना दुख व दूसरे की इच्छा को अपनी इच्छा समझता रहा। वह दूसरों का जी न दुखाना चाहता था; उससे किसी ने किसी कागज पर हस्ताक्षर करने को कहा या धन उधार मांगा या किसी बिल पर हस्ताक्षर करने को कहा तो उसने सबको खुश किया। कभी किसी को इनकार नहीं करा। ऐसे लोग बहुत थे, जो उसकी इस कमजोरी को भली-भांति जानते थे, और कहते थे कि उसमे इन्कार करने का चारित्रिक साहस ही नहीं था।
उसके पिता उसे छोटी-सी सम्पत्ति दे गए थे, पर उसे तुरन्त ही ऐसे लोगों ने आ घेरा, जो उसमें से हिस्सा लेना चाहते थे। वही समय था जब वह उन्हें 'इनकार' कर देता। परन्तु वह 'ना' न कह सका। उसकी 'झुक जाने' की आदत बन चुकी थी। इनकार करना उसे बुरा लगता था। कोई तकाजा उसे सहन न था। जब कभी उसकी जेब से पैसे निकलवाने के लिए किसी ने मांगा तो वह तुरन्त दे दिया करता था। जब तक उसके पास धन रहा, तब तक उसके मित्रों की कोई कमी न थी। वह सबके फैसले कराता था। हरेक के लिए जमानत देने को तैयार रहता था। उसके विशेष मित्रों द्वारा प्रायः उससे आग्रह किया जाता था-'कृपया इस चिट पर हस्ताक्षर कर दीजिए!'
वह नम्रता से पूछता-"यह कैसी चिट है?" क्योंकि अपनी सम्पूर्ण सरलता व सीथेपन के बावजूद उसे अपनी सतर्कता पर अभिमान था, परन्तु उसने कभी भी इनकार न किया। तीन महीने बाद एक बड़ी भारी रकम का बिल बन जाता और उसका भुगतान करने के लिए 'सब के मित्र' के सिवा कौन आगे आता? उसे ही भुगतान करना पड़ता, इस तरह उसकी 'इनकार' न करने की कमजोरी ने उसे कहीं का नहीं रखा।
जीवन में, अल्प-आयु में ही कहना सीखिए "यह खर्च मेरी सामर्थ्य से बाहर है।" यह शक्ति, साहस और पौरुष का चिन्ह है। डॉ. फ्रेंकलिन का कथन है, "हमारी आंखें नहीं बल्कि अन्य लोगों की आंखें हमें बर्बाद करती है।" शेक्सपीयर ने कहा है, "फैशन के कारण जितनी पोशाके नष्ट होती हैं, उतनी मनुष्य के पहनने के कारण नहीं फटतीं।"
पी. टी. बारनम का कथन है, "हम स्वतन्त्र और समान उत्पन्न हुए हैं," यह एक अर्थ में गौरवपूर्ण सत्य. है, तथापि हम सब समान रूप से धनी नहीं पैदा हुए और हम कभी समान......
Details of Book :-
Particulars | Details (Size, Writer, Dialect, Pages) |
|---|---|
| Name of Book: | आज की बचत कल का सुख | Aaj Ki Bachat Kal Ki Sukh |
| Author: | Orison Swett Marden |
| Total pages: | 164 |
| Language: | हिंदी | Hindi |
| Size: | 45 ~ MB |
| Download Status: | Available |
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