Free Hindi Book Ankhon Ki Suiyaan In Pdf Download
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पुस्तक का संक्षिप्त विवरण:
भारत की कहानियाँ अपने अन्दर बड़े-बड़े तथ्य रखती हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि इस देश के ज्ञानियों ने कहानियों के रूप में जीवन की रहस्यमय गुत्थियों को सुलझाया और गूढ़तम समस्याओं को हल किया है मा फिर नीरस वास्तविकताओं को चलते-फिरते जीवन में परिणत करने का प्रयत्न किया है। हम इन छोटी-छोटी कहानियों की सहायता से जीवन के महान तथ्यों का दिग्दर्शन तथा मनन कर कते है।
बचपन में हमने जो कहानियाँ सुनी थीं और जो दिमाग के परदे में छिपी थीं उनमें एक ऐसी कहानी भी थी जिसमें किसी अत्याचार-पीड़ित दुखिया स्त्री की वेदनापूर्ण कथा वर्णन की गयी थी। इस स्त्री के सम्पूर्ण शरीर में सुइयाँ चुभी हुई थीं। एक दूसरी चालाक स्त्री दिन भर उसकी सुइयाँ निकालती रहती थी मगर आँखों की सुइयाँ छोड़ देती थी। इतने में शाम हो जाती थी। दूसरे दिन प्रातःकाल होते ही फिर नई सुइयाँ आप ही आप उसके शरीर में चुभ जाती थीं और वहीं दूसरी स्त्री फिर दिन भर निकालती रहती थी और शाम होते-होते आँखों की सुइयाँ छोड़ देती थी। हमें कहानी के इतने ही भाग से मतलब है।
आप विचार करेंगे तो अत्याचार-पीड़ित मानवता के साथ दीर्घ काल से यही व्यवहार होता चला आ रहा है। उसका सम्पूर्ण शरीर सुइयों से छलनी हो रहा है। शरीर के सभी अंग प्रत्यंगों में सुइयाँ चुभी हुई हैं। कुछ सहानुभूति युक्त हाथ उसकी यह सुइयाँ निकालने के लिए उठते और आगे बढ़ते हैं किन्तु हर बार आँखों को सुइयाँ छोड़ देते हैं और उसकी मुक्ति का कार्य अपूर्ण रह जाता है। जिसका परिणाम यह होता है कि दूसरे दिन वह पूर्ववत घायल और विपदग्रस्त दिखाई देने लगती है और पुनः परिश्रम करना पड़ता है।
मानवता, एक पूर्ण मानव शरीर तथा मानव अस्तित्व की प्रति-निधि है। वह जीवन-कार्यालय के समस्त विभागों की अध्यक्ष है। उसके साथ शरीर भी है, पेट भी है, मन भी है, मस्तिष्क भी है और आत्मा भी है। फिर इन सब अगों के साथ कुछ विपत्तियाँ और कुछ दुख भी हैं। यही उसके शरीर की सुइयाँ हैं जो उसको दुर्बल तथा शक्तिहीन किये हुए हैं।
क्षुधा, अनशन, दुभिक्ष तथा शुद्ध भोजन की अप्राप्ति ये पेट की मुइयाँ हैं। निस्संदेह इनसे मानवता को कष्ट और दुख होता है। मानव-ससार का यह दुर्भाग्य है और जीवन की यह बड़ी लज्जाजनक अवस्था है कि प्रकृति की अपूर्व दानशीलता तथा खाद्य-सामग्री की यथेष्टता के होते हुए भी कतिपय व्यक्तियों के अनुचित माधिपत्य अथवा किसी शासन-व्यवस्था के निरंकुश व्यवहार के कारण मनुष्यों की भारी संख्या को पेट भर भोजन प्राप्त न हो सके और वह अपने स्वाभाविक अधिकारों और आवश्यक जीवन-सामग्री से वंचित रहें। इस पर शोक, क्रोध, क्षोभ तथा असन्तोष प्रगट करना, और इस अवस्था के विरुद्ध प्रयत्नशील होना एक स्वाभाविक बात है जिस पर आश्चर्यं प्रकट करने अथवा दूसरों को लज्जित करने का कोई अवसर नहीं ।
Details of Book :-
Particulars | Details (Size, Writer, Dialect, Pages) |
|---|---|
| Name of Book: | आँखों की सुइयाँ | Ankhon Ki Suiyaan |
| Author: | Abul Hasan Ali Hasani Nadwi |
| Total pages: | 17 |
| Language: | हिंदी | Hindi |
| Size: | 2.1 ~ MB |
| Download Status: | Available |
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