Free Hindi Book Chidanand Atmakatha In Pdf Download
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पुस्तक का संक्षिप्त विवरण:
दक्षिण भारत के पश्चिम समुद्र तटीय क्षेत्र में नदी किनारे बसा एक नगर मंगलौर मेरी जन्मभूमि है। वहाँ पर मेरे मातामह नेलीकई वेंकटराव तथा उनकी धर्मपत्नी श्रीमती सुन्दरम्मा का निवास स्थान था। वहीं पर २४ सितम्बर १९१६ को मेरा जन्म हुआ। वे दोनों अत्यन्त पवित्र एवं उदारहृदय थे। विशेषतया निर्धनों एवं जरूरतमन्दों की मदद में सदैव तत्पर रहते थे। मेरी जननी श्रीमती सरोजिनी देवी मेरे नाना-नानीश्री की बहुत लाड़ली सुपुत्री थीं। कारण कि इकलौती यही सन्तान थी, जो जीवित रह सकी। इनके जन्म से पूर्व कितने ही पुत्र मृत्यु को प्राप्त होते गये थे। अठ्ठाइस वर्ष की अवस्था में मेरी माताश्री की लौकिक यात्रा भी दैववश समाप्त हो गयी। उस समय तक वह पाँच बच्चों की माता बन चुकी थीं। जब वह स्वर्ग सिधारी, मेरी बड़ी बहिन हेमलता बाई ग्यारह वर्ष की तथा में नौ वर्षीय बालक था। अपने परिवार में जैसे माताश्री अपने जननी जनक की लाड़ली थीं, इसी प्रकार मैं उस परिवार का पहला पुत्र होने के नाते सबका लाड़ला था। श्रीधर को अर्थात् मुझे अपनी मातामही तथा माताश्री के ममतापूर्ण पारस्परिक होड़ में अधिकाधिक लाड़-प्यार मिलता रहा। इस प्रकार में उनकी 'आँखों का तारा' बना रहा।
पिताश्री श्रीनिवास राव का परिवार मद्रास में रहता था। उनकी यह इच्छा थी कि अब सब अपने घर मद्रास में आ जायें। मेरे मातामह तथा मातामही ने पिताश्री से साग्रह अनुनय विनय की; परिवार का प्रथम पुत्र होने के कारण मेरा लालन-पालन, उच्च पढ़ाई-लिखाई मंगलौर में ही होना समुचित रहेगा। उनकी हार्दिक लालसा उत्कण्ठा को पहचान कर मेरे पिताश्री द्वारा सहमति प्रदान करना अप्रत्याशित तथा विस्मयजनक था। इस प्रकार मंगलौर शहर में उच्च शिक्षा ग्रहण करते हुए जीवन के १६ वर्ष व्यतीत हो गये।
मंगलौर शहर पापा रामदास जी के निवास स्थान कन्हनगढ़ के समीपस्थ था। सन् १९२३ में पापा रामदास जी का सम्पूर्ण वर्ष भारत भ्रमण में व्यतीत हुआ था। वापिस आने पर मंगलौर शहर के बाहर कदरी-पहाड़ियों की गुफा में सतत राम-नाम का जप करते हुए आनन्दपूर्वक एकान्तवास किया। वहाँ पर उन्हें अपने यात्रा वृत्तान्त को लिखने की अन्तः प्रेरणा हुई और सन् १९२४ की अवधि में उन्होंने इस कार्य को पूर्ण भी कर लिया। वहाँ के एक सज्जन श्री बोलर विठ्ठल राव, जो नानाश्री के मित्र भी थे, उनकी 'सरस्वती' नामक प्रिंटिंग प्रेस में यह पुस्तक अंग्रेजी में इन क्वेस्ट ऑफ गॉड' अर्थात् 'ईश्वर की खोज में' प्रकाशित हो गयी। नानाश्री को इसकी प्रथम प्रति अपने मित्र द्वारा भेंट में प्राप्त हुई थी। एक दिन उस पुस्तक पर मेरी दृष्टि पड़ गयी। कवर पेज पर पापा रामदास जी के मनमोहक चित्र को मैं देखता ही रह गया। जैसे-जैसे मैं चित्र को निहारता रहा, उसी में रमता गया। सबकी नजर बचाकर, ऊपरी मंजिल के हॉल में बैठकर प्रतिदिन दोपहर को उस पुस्तक को आदि से अन्त तक पढ़कर मैंने एक सप्ताह में पूर्ण कर दिया।
उस समय मैं नौ वर्षीय मातृ-विहीन बालक ही था। चतुर्थ श्रेणी का छात्र था। इस पुस्तक को पढ़ने से मुझे भारत देश का सिंहावलोकन हो गया जिससे अब तक मैं पूर्णतया अपरिचित था। देश के विभिन्न धार्मिक स्थानों का पता चला, जो मेरी कल्पना में भी नहीं थे। 'हिमालय' में सुस्थित 'बद्रीनारायण' तथा 'केदारनाथ' मन्दिर, कलकत्ता के पास 'दक्षिणेश्वर' के श्री रामकृष्ण परमहंस का तथा भवतारिणी के 'काली मन्दिर' इत्यादि का प्रथम परिचय मिला। 'अन्नक्षेत्र', 'भिक्षा' 'राम-भजन' आदि शब्द मेरे शब्दकोष का अंग बन गये। 'समाधि', 'भावातीत अवस्था', शब्दों से पहली बार परिचित हुआ।
Details of Book :-
Particulars | Details (Size, Writer, Dialect, Pages) |
|---|---|
| Name of Book: | चिदानन्द आत्मकथा | Chidanand Atmakatha |
| Author: | Swami Chidanand |
| Total pages: | 65 |
| Language: | हिंदी | Hindi |
| Size: | 11 ~ MB |
| Download Status: | Available |
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