Sri Aurobindo – संक्षिप्त जीवनी
श्री अरविंद (1872–1950) भारत के महान दार्शनिक, योगी, कवि और राष्ट्रवादी नेता थे। उनका जन्म 15 अगस्त 1872 को कोलकाता में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा इंग्लैंड में हुई, जहाँ उन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से अध्ययन किया। भारत लौटने के बाद वे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े और क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लिया।
1908 में अलीपुर बम कांड में उन्हें जेल हुई। जेल में ही उन्हें गहन आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त हुआ, जिसने उनके जीवन की दिशा बदल दी। बाद में वे राजनीति से अलग होकर पांडिचेरी (अब पुडुचेरी) में साधना करने लगे। वहीं उन्होंने इंटीग्रल योग (समन्वित योग) का सिद्धांत विकसित किया।
उनका मानना था कि मानव जीवन का लक्ष्य केवल मोक्ष नहीं, बल्कि दिव्य चेतना को धरती पर स्थापित करना है। 5 दिसंबर 1950 को उनका महाप्रयाण हुआ।
प्रमुख पुस्तकें और उनका संक्षिप्त विवरण
1. The Life Divine (दिव्य जीवन)
यह उनकी प्रमुख दार्शनिक कृति है। इसमें उन्होंने मानव जीवन, ब्रह्मांड, चेतना और ईश्वर के संबंध को विस्तार से समझाया है। पुस्तक में बताया गया है कि मानव चेतना का विकास दिव्यता की ओर हो सकता है।
2. Savitri (सावित्री)
यह एक महाकाव्य है जो महाभारत की कथा पर आधारित है। इसमें सत्यवान और सावित्री की कथा के माध्यम से जीवन, मृत्यु और अमरत्व का गूढ़ आध्यात्मिक संदेश दिया गया है।
3. Essays on the Gita
इस पुस्तक में उन्होंने भगवद्गीता की आधुनिक और आध्यात्मिक व्याख्या प्रस्तुत की है। इसमें कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग का समन्वय बताया गया है।
4. The Synthesis of Yoga
यह पुस्तक उनके योग-दर्शन का विस्तार है, जिसमें विभिन्न योग मार्गों को एकीकृत कर समग्र साधना का मार्ग बताया गया है।
