Free Hindi Book Hindi Sahitya Ka Itihas In Pdf Download
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पुस्तक का संक्षिप्त विवरण:
हिन्दी साहित्य का इतिहास
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
“हिन्दी साहित्य का इतिहास” हिन्दी साहित्य के इतिहास-लेखन की सबसे महत्वपूर्ण और प्रभावशाली कृतियों में से एक है। इसके रचयिता आचार्य रामचन्द्र शुक्ल (1884–1941) हिन्दी के महान आलोचक, निबंधकार और साहित्येतिहासकार थे। उन्होंने हिन्दी साहित्य को केवल कवियों और उनकी रचनाओं की सूची के रूप में प्रस्तुत नहीं किया, बल्कि साहित्य को तत्कालीन सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों से जोड़कर देखने का प्रयास किया।
पुस्तक की विशेषता
रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार साहित्य समाज के जीवन से अलग नहीं होता। जिस समय समाज में जैसी परिस्थितियाँ होती हैं, साहित्य पर भी उनका प्रभाव पड़ता है। इसी दृष्टिकोण के कारण उनकी इतिहास-दृष्टि को लोकमंगलवादी और सामाजिक दृष्टिकोण से युक्त माना जाता है।
उन्होंने हिन्दी साहित्य के विकास को मुख्यतः चार कालों में विभाजित किया-
- आदिकाल - वीरगाथा काल
- पूर्व मध्यकाल - भक्तिकाल
- उत्तर मध्यकाल - रीतिकाल
- आधुनिक काल - गद्यकाल
1. आदिकाल - वीरगाथा काल
आचार्य शुक्ल ने हिन्दी साहित्य के प्रारंभिक काल को मुख्यतः वीरगाथा काल कहा। इस काल में राजाओं, योद्धाओं और युद्धों का वर्णन करने वाली रचनाएँ प्रमुख थीं। वीरता, युद्ध, राजकीय गौरव और आश्रयदाता की प्रशंसा साहित्य की प्रमुख प्रवृत्तियाँ थीं।
इस काल की प्रसिद्ध रचनाओं में ‘पृथ्वीराज रासो’ का विशेष उल्लेख मिलता है। चंदबरदाई को इसका प्रमुख कवि माना जाता है।
इस युग के साहित्य में वीर रस की प्रधानता दिखाई देती है, हालांकि धार्मिक और अन्य प्रकार की रचनाएँ भी इस समय मौजूद थीं।
2. पूर्व मध्यकाल - भक्तिकाल
रामचन्द्र शुक्ल ने हिन्दी साहित्य के इतिहास में भक्तिकाल को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान दिया। इस काल में भक्ति साहित्य का व्यापक विकास हुआ। उन्होंने भक्तिकाव्य की प्रमुख धाराओं को दो बड़े वर्गों में देखा-
निर्गुण भक्ति धारा
इसमें ईश्वर को निराकार और निर्गुण माना गया। इसके अंतर्गत प्रमुखतः-
- ज्ञानाश्रयी शाखा - कबीर आदि
- प्रेमाश्रयी शाखा - जायसी आदि
आते हैं।
कबीर ने बाहरी आडंबर, जातिगत भेदभाव और धार्मिक पाखंड का विरोध करते हुए आत्मज्ञान और सच्ची भक्ति पर बल दिया।
मलिक मोहम्मद जायसी की प्रसिद्ध रचना ‘पद्मावत’ प्रेमाश्रयी सूफी काव्य की महत्वपूर्ण कृति है।
सगुण भक्ति धारा
सगुण भक्ति के अंतर्गत ईश्वर के साकार रूप की उपासना की गई। इसकी दो प्रमुख शाखाएँ हैं-
रामभक्ति शाखा - इसके प्रमुख कवि गोस्वामी तुलसीदास हैं। उनकी महान कृति ‘रामचरितमानस’ हिन्दी साहित्य की अमूल्य धरोहर है।
कृष्णभक्ति शाखा - इसके प्रमुख कवियों में सूरदास का विशेष स्थान है। उनके काव्य में कृष्ण की बाल-लीलाओं, प्रेम और वात्सल्य का अत्यंत सुंदर चित्रण मिलता है।
3. उत्तर मध्यकाल - रीतिकाल
भक्तिकाल के बाद हिन्दी साहित्य में रीतिकाल का विकास हुआ। इस काल में काव्यशास्त्र, अलंकार, रस, नायिका-भेद और श्रृंगार का विशेष महत्व रहा।
रीतिकाल के प्रमुख कवियों में-
- केशवदास
- बिहारी
- भूषण
- देव
- पद्माकर
- घनानंद
आदि का उल्लेख किया जाता है।
इस काल में श्रृंगार रस की प्रधानता थी। बिहारी की ‘बिहारी सतसई’ इस युग की प्रसिद्ध कृति है। वहीं भूषण ने वीर रस की प्रभावशाली रचनाएँ कीं।
रामचन्द्र शुक्ल ने रीतिकाल की काव्यगत उपलब्धियों के साथ-साथ उसकी सीमाओं की ओर भी संकेत किया।
4. आधुनिक काल - गद्यकाल
आधुनिक काल में हिन्दी साहित्य में व्यापक परिवर्तन हुआ। खड़ी बोली हिन्दी का विकास हुआ और गद्य साहित्य की विभिन्न विधाओं का विस्तार हुआ।
इस काल में सामाजिक सुधार, राष्ट्रीय चेतना, आधुनिक शिक्षा, पत्रकारिता और स्वतंत्रता आंदोलन जैसे विषय साहित्य में दिखाई देने लगे।
आधुनिक हिन्दी साहित्य के विकास में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का महत्वपूर्ण योगदान रहा। उन्हें हिन्दी के आधुनिक युग का प्रमुख प्रवर्तक माना जाता है।
इसके बाद महावीर प्रसाद द्विवेदी के समय हिन्दी गद्य और पद्य में भाषा की शुद्धता, सामाजिक चेतना तथा राष्ट्रीय भावना को बल मिला।
आगे चलकर हिन्दी कविता में छायावाद का विकास हुआ, जिसके प्रमुख कवियों में-
- जयशंकर प्रसाद
- सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’
- सुमित्रानंदन पंत
- महादेवी वर्मा
का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।
आधुनिक काल में कहानी, उपन्यास, नाटक, निबंध और आलोचना जैसी साहित्यिक विधाओं का भी तेजी से विकास हुआ।
रामचन्द्र शुक्ल की इतिहास-दृष्टि
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने साहित्य को जनजीवन और समाज से जोड़कर देखा। उनके लिए साहित्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं था, बल्कि वह लोकजीवन की भावनाओं, संघर्षों और आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति भी था।
उनकी साहित्य-दृष्टि में लोकमंगल का विशेष महत्व है। वे ऐसे साहित्य को अधिक महत्व देते हैं जो मानव जीवन को व्यापक और उदात्त बनाता है।
उन्होंने कवियों का मूल्यांकन केवल उनकी भाषा और अलंकारों के आधार पर नहीं किया, बल्कि उनके विचार, भावबोध, सामाजिक प्रभाव और लोकहित को भी महत्व दिया।
पुस्तक का महत्व
‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ ने हिन्दी साहित्य के इतिहास-लेखन को एक व्यवस्थित दिशा प्रदान की। इसके कारण साहित्य के विभिन्न कालों, प्रवृत्तियों और प्रमुख रचनाकारों को एक क्रमबद्ध ऐतिहासिक दृष्टि से समझने में सहायता मिलती है।
यह पुस्तक आज भी हिन्दी साहित्य के विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी मानी जाती है।
निष्कर्ष
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ केवल साहित्यिक रचनाओं का इतिहास नहीं है, बल्कि हिन्दी समाज की बदलती चेतना, भावनाओं और सांस्कृतिक विकास को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम है। उनकी इतिहास-दृष्टि ने हिन्दी साहित्य के अध्ययन को वैज्ञानिक, सामाजिक और आलोचनात्मक आधार प्रदान किया। इसी कारण रामचन्द्र शुक्ल को हिन्दी का एक महान साहित्येतिहासकार और आलोचक माना जाता है।
Details of Book :-
Particulars | Details (Size, Writer, Dialect, Pages) |
|---|---|
| Name of Book: | हिन्दी साहित्य का इतिहास | Hindi Sahitya Ka Itihas |
| Author: | Acharya Ramchandra Shukla |
| Total pages: | 841 |
| Language: | हिंदी | Hindi |
| Size: | 5.4 ~ MB |
| Download Status: | Available |
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