Free Hindi Book Durgati Se Bacho In Pdf Download
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पुस्तक का संक्षिप्त विवरण:
भगवान्ने कहा है कि भूत-प्रेतोंकी उपासना करनेवाले भूत-प्रेत ही बनते हैं
प्रश्न: भगवान्ने कहा है कि भूत-प्रेतोंकी उपासना करनेवाले भूत-प्रेत ही बनते हैं (९।२५); ऐसा क्यों?
उत्तर: भूत-प्रेतोंकी उपासना करनेवालोंके अन्तःकरणमें भूत-प्रेतोंका ही महत्त्व होता है और भूत-प्रेत ही उनके इष्ट होते हैं। अतः अन्तकालमें उनको प्रेतोंका ही चिन्तन होता है और चिन्तनके अनुसार वे भूत-प्रेत बन जाते हैं (८।६)।
जो यहाँसे चला जाता है, मर जाता है, उसको ‘प्रेत’ कहते हैं और उसके पीछे जो मृतक कर्म किये जाते हैं, उनको शास्त्रीय परिभाषामें ‘प्रेतकर्म’ कहते हैं। जो पाप-कर्मोंकी दुर्गतिसे बच सकता है, वह भी प्रेत कहा जाता है। भूत, पिशाचकी योनिमें चले जानेवालोंको भी ‘प्रेत’ कहा जाता है। अतः यहाँ पापोंके कारण नीच योनियोंमें गये हुएके वाचकके रूपमें ‘प्रेत’ शब्द आया है।
अगर कोई मनुष्य यह सोचे कि अभी तो मैं पाप कर लूँ, व्यभिचार, अत्याचार कर लूँ, फिर जब मरने लगूँगा, तब भगवान्का नाम ले लूँगा, भगवान्को याद कर लूँगा, तो उसका यह सोचना सर्वथा गलत है। कारण कि मनुष्य जीवनभर जैसा कर्म करता है, मनमें जैसा चिन्तन करता है, अन्तकालमें उसीका चिन्तन होनेकी सम्भावना रहती है।
भूत-प्रेत और पितरमें अन्तर
प्रश्न: भूत-प्रेत और पितरमें क्या अन्तर है?
उत्तर: ऐसे तो भूत, प्रेत, पिशाच, पितर आदि सभी देवयोनियाँ कहलाती हैं, पर उनमें भी कई भेद होते हैं।
भूत-प्रेतोंका शरीर वायुप्रधान होता है; अतः वे हरेकको नहीं दीखते। हाँ, अगर वे स्वयं किसीको अपना रूप दिखाना चाहें तो दिखा सकते हैं। उनको मल-मूत्र आदि अशुद्ध चीजें खानी पड़ती हैं। वे शुद्ध अन्न-जल नहीं खा सकते; परंतु कोई उनके नामसे शुद्ध पदार्थ दे तो वे खा सकते हैं। भूत-प्रेतोंके शरीरोंसे दुर्गन्ध आती है।
पितर भूत-प्रेतोंसे ऊँचे माने जाते हैं। पितर प्रायः अपने कुटुम्बके साथ ही सम्बन्ध रखते हैं और उसकी रक्षा तथा सहायता करते हैं। वे कुटुम्बियोंको व्यापार आदिकी बात बता देते हैं, उनको अच्छी सम्मति देते हैं और अगर घरवाले बँटवारा करना चाहें तो उनका बँटवारा कर देते हैं, आदि।
पितर गायके दूधसे बनी गरम-गरम खीर खाते हैं, गंगाजल जैसा ठंडा जल पीते हैं और शुद्ध पदार्थ ग्रहण करते हैं। कई पितर घरवालोंको दुःख भी देते हैं और तंग भी करते हैं।
भूत-प्रेत कहाँ रहते हैं?
प्रश्न: भूत-प्रेत कहाँ रहते हैं?
उत्तर: भूत-प्रेत प्रायः श्मशानमें, श्मशानके वृक्षोंमें रहते हैं। वे सरोवरके किनारे भी रहते हैं। वे सरोवरका पानी नहीं पी सकते, पर जलकी ठंडी हवा उनको अच्छी लगती है और उससे उनको सुख मिलता है।
पीपलके वृक्षका स्वभाव सबको आश्रय देनेका होनेसे उसकी छायामें भी भूत-प्रेत रहते हैं। कोई उनके नामसे छतरी बनवा देता है तो वे उसके भीतर रहते हैं। कोई मकान कई दिनसे सूना पड़ा हो तो उसमें भी भूत-प्रेत रहने लग जाते हैं।
भूत-प्रेत मनुष्यके शरीरमें किस द्वारसे प्रवेश करते हैं?
प्रश्न: भूत-प्रेत किसी मनुष्यको पकड़ते हैं तो वे उसके शरीरमें किस द्वारसे प्रवेश करते हैं?
उत्तर: भूत-प्रेतोंका शरीर वायुप्रधान होता है; अतः वे मनुष्य-शरीरमें किसी भी द्वारसे प्रवेश कर सकते हैं। वे आँख, कान, त्वचा आदि किसी भी इन्द्रियसे शरीरमें प्रविष्ट हो सकते हैं। परन्तु वे प्रायः मलिन द्वारसे अर्थात् मल-मूत्रके स्थानसे अथवा प्राणोंसे ही मनुष्य-शरीरमें प्रविष्ट होते हैं।
शरीरमें प्रविष्ट होनेपर भूत-प्रेत कहाँ रहते हैं?
प्रश्न: शरीरमें प्रविष्ट होकर भूत-प्रेत कहाँ रहते हैं?
उत्तर: शरीरमें प्रविष्ट होकर भूत-प्रेत अहंवृत्तिमें अर्थात् अन्तःकरणमें रहते हैं।
‘अहम्’ दो प्रकारका होता है—
- अहंकार
- अहंवृत्ति
अहंकार जीवात्मामें रहता है और अहंवृत्ति अन्तःकरणमें रहती है। भूत-प्रेत श्वास आदिके द्वारा मनुष्यके शरीरमें प्रविष्ट होकर अहंवृत्तिमें रहकर इन्द्रियोंके स्थानोंको काममें लेते हैं।
Details of Book :-
Particulars | Details (Size, Writer, Dialect, Pages) |
|---|---|
| Name of Book: | दुर्गतिसे बचो | Durgati Se Bacho |
| Author: | Gita Press, Gorakhpur |
| Total pages: | 66 |
| Language: | हिंदी | Hindi |
| Size: | 3.1 ~ MB |
| Download Status: | Available |
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