Free Hindi Book Dharm Aur Uska Abhipray In Pdf Download
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पुस्तक का संक्षिप्त विवरण:
"धर्म" शब्द भारतीय ऋषियों की देन है। भारतीय ऋषियों द्वारा धर्म-शास्त्रों में दी गयी परिभाषाओं को पुस्तक में उद्धृत करते हुए उसका जो अभिप्राय व्यक्त किया गया है वह तर्कसम्मत तथा प्रामाणिक है।
"धर्म" शब्द का उद्भव संस्कृत भाषा के 'धृ' धातु से हुआ है। जिसका अर्थ होता है धारण करना अर्थात् घारण करना ही 'धर्म' है। भारतीय ऋषियों ने इसी सन्दर्भ में धर्म को परिभाषित करते हुए कहा है कि "धारणाद्धर्म इत्याहुः" अर्थात् (ब्रह्म को मन से) घारण करना ही धर्म है। इसका अभिप्राय इस प्रकार है मन सब समय चंचल है। इसे स्थिर कर मन से ब्रह्म को धारण करना ही धर्म है। इसका परिणाम होता है ब्रह्म-साक्षात्कार, मोक्ष या ब्रह्म में लय होना। योगिराज सत्य चरण लाहिड़ी ने ठीक ही कहा है कि ब्रह्म-साक्षात्कार करना ही मनुष्य का धर्म है।
ब्रह्म-साक्षात्कार की अवस्था को प्राप्त ऋषि अन्तर्यामी दिव्य दृष्टि प्राप्त होते हैं। इस अवस्था को प्राप्त करना तब तक सम्भव नहीं जब तक मनुष्य के भीतर मानवता तथा नैतिकता (अहिंसा, सत्य, दान उपकार, दया, कृतज्ञता, क्षमा आदि) पूर्ण रूप से विकसित नहीं हो जाती। श्रद्धापूर्वक मन को जिस अनुपात में ईश्वर के साथ लगाया जाता है उसी अनुपात में मानवता तथा नैतिकता विकसित होती है।
मानवता तथा नैतिकता से परिपूर्ण समाज सभ्य सुसंस्कृत नैतिक एवं सदाचारी समाज होता है। अतः धर्म स्वयं व्यक्ति के लिए तथा समाज के लिए आवश्यक है। 'धर्म' रिलीजन का पर्यायवाची नहीं है। लेखक का उपयुक्त निष्कर्ष तथ्यों पर आधारित तर्क सम्मत है।
पुस्तक में गीता का संदेश, भारतीय संस्कृति, ब्राह्मण तथा ब्राह्मण-वाद, विज्ञान के आलोक में धर्म तथा धर्म निरपेक्षता आदि विषयों पर व्यक्त किये गये विचार विद्वतापूर्ण है। सभी तथ्य तर्कसम्मत हैं तथा अपेक्षित प्रमाणों द्वारा विश्वसनीय बन गया है। 'धर्म' शास्त्रों के तथ्यों के साथ रोचक कथानकों के वर्णन से पुस्तक रोचक बन गयी है। इसकी भाषा सहज और बोधगम्य है।
Details of Book :-
Particulars | Details (Size, Writer, Dialect, Pages) |
|---|---|
| Name of Book: | धर्म और उसका अभिप्राय | Dharm Aur Uska Abhipray |
| Author: | Yogiraj Lahiri Mahasaya |
| Total pages: | 152 |
| Language: | हिंदी | Hindi |
| Size: | 16.4 ~ MB |
| Download Status: | Available |
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