१६ लल्लनटॉप कहानियाँ | 16 LALLANTOP KAHANIYAN HINDI BOOK FREE PDF DOWNLOAD

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पुस्तक का संक्षिप्त विवरण:

कहानी कहने से बनी। सबसे पहले किसने कहा। माँ ने आ... आ...आ... से ये सफ़र शुरू हुआ। पहला पड़ाव आ से होकर माँ तक पहुँचा। फिर माँ ने बड़ा किया। उस क्रम में खूब कहानियाँ सुनायीं। गोपाल भइया और उनके दाऊ की। अकबर-बीरबल की। राम की। कृष्ण की। फूला रानी की। फिर अक्षर मिलाकर पढ़ना सीखा गाँव के प्राइमरी स्कूल में। छोटा अ से अनार। जो आ सुना था, वह ध्वनि थी। यहाँ उसे आकार मिल गया। कमल कमल तक पहुँचा। फिर पूरे वाक्य। और जब वाक्य मिलाकर पढ़ने लगे तो सबसे ज्यादा क्या पढ़ा। कहानियाँ। नयी क्लास की किताबें आतीं तो सबसे पहले सारी कहानियाँ पढ़ जाते। इतिहास की किताब में भी युद्ध और शान्ति के किस्सों की तलाश रहती। मन की सराय में यही थे जो सबसे ज्यादा रुकते और जब जाते, तब भी निशाँ छोड़ जाते। यहाँ हर कोई आता। प्रेमचन्द भी और मनोहर कहानियाँ भी। सुपर कमांडो ध्रुव भी और चेखव भी। इसी सिलसिले ने एक समझ दी। हमारे दौर की मेरे जानिब सबसे बड़ी समझ. ये जो इंटरनेट के दौर में हम हर वक़्त तथ्य को इकलौता सत्य मान बैठे हैं। और उसके लिए याददाश्त के बजाय मशीन पर बसेरा करने लगे हैं। तब कल्पना, किस्से, स्मृति और उन्हें बयाँ करते शब्द ही हैं, जो हमारे होने को बचाये रखेंगे। कुल जमा अपनी यादों के पुतले ही तो हैं हम। ये अगरबत्ती से उठते धुएँ-सी है। जो हर बार कुछ ऊपर उठ अपनी दिशा तय करती है। हर बार अलग। साइंस की भाषा में कहें तो ब्राउनियन मोशन-सी कल्पना। और उसे कुछ तरतीबी देते हैं किस्से। भाषा के खाँचे में फिट करते। कुछ रन्दा चलता। कुछ पॉलिश होती। और एक ठोस चीज़ हासिल होती।

और इसी सोच के चलते लल्लनटॉप ने नैरेटिव पर ज्यादा ध्यान रखा। चाहे नेताओं की बात हो या समाज की। उसकी सोच, समझ, सूरत, सीरत को कहानियाँ, संस्मरणों, अनुभवों के जरिए प्रस्तुत किया। एक ऐसे समय में जब हिन्दी साहित्य को बाजारवाद में पिछड़ता करार दिया गया। जब हिन्दी को पिछड़ेपन की चिन्हारी माना जाने लगा। हमने हिन्दी को अपनी सबसे बड़ी ताक़त पाया। और ये हिन्दी आधुनिकता के छद्म तकाज़े से पैदा नहीं हुई। इसमें नयेपन के नाम पर सिर्फ़ अंग्रेज़ी के शब्द नहीं भरे गये। इसे दी गयी ज़मीन की ताक़त। आंचलिकता की ताक़त। ब्रज हो या बुलेन्दी। अवधी हो या भोजपुरी। हरियाणवी या पंजाबी।

राजस्थानी या फिर मालवा या बघेली। सब हिन्दी की जड़ों को सींच रही हैं। अकुण्ठ भाव से शब्द आवाजाही कर रहे हैं। इन शब्दों को अपने पिटारे में रख नयी पीढ़ी दुनिया नाप रही है। कोई गाँव छोड़ शहर आया। कोई शहर छोड़ महानगर और कोई इस चौहद्दी को लाँघ विदेश गया। उसका उलटा भी हुआ। मगर ये मादरी ज़बान के सिक्के खनखनाते रहे। अपनी शुरुआत, अपने आत्म का भान कराते रहे। और इस क्रम में हमने दोनों दुनिया साध लीं। नये के प्रति अतिरिक्त मोह नहीं और पुराने के प्रति पूरा तिरस्कार भी नहीं। मध्य मार्ग. सम भाव से।

ख़बरों और भाषा का ऐसा कारवाँ जिसमें अवधी की कहावतें और उनके मूल में छिपा प्रसंग भी उतना ही जरूरी है, जितनी किसी रैपर के बोलों में छिपी बग़ावत। जहाँ गुड्‌डी गिलहरी और एडेल, दोनों को सुनने-समझने का चाव हो। जहाँ शिम्बोर्का को भी गुना जाये और समीर के लिखे फिल्मी गानों पर भी विचार किया जाये। जहाँ मार्खेज को पढ़ते हुए मनोहर कहानियाँ के प्रति हेय भाव न रखा जाये। क्योंकि जो लोकप्रिय है, वह भी मानस रच रहा है। शास्त्र और लोक, दोनों का सन्धान हो। वाद-विवाद-संवाद हो। ऐसा भाव रहा। और इसने खूब सफलता हासिल की। अपनी शुरुआत से ही 'दि लल्लनटॉप डॉट कॉम' को पाठकों और दर्शकों की प्रतिक्रिया मिली। उन्हें हमसे एक जुड़ाव महसूस हुआ। इसका अगला क़दम था कि उनकी आवाज़ का भी यह एक मंच बने। वह भी अपनी बात कह सकें। पूछ सकें। इस नजरिए से लल्लनटॉप अड्डे की शुरुआत हुई। जहाँ हस्तियाँ आती हैं, हँसती हैं, बतियाती हैं। इसी विचार का एक पड़ाव लल्लनटॉप कहानी कॉम्पिटिशन भी है जिसके पहले संस्करण में सैकड़ों कहानियाँ लिखी गयी। उनमें से चुनी गयीं ये 16 कहानियाँ आपके सामने हैं। मैं अकसर कहता हूँ कि बाज़ार और तकनीकी हिन्दुस्तानी के लिए आगे बढ़ने का एक मौक़ा हैं, कमज़ोरी नहीं। इसी बाज़ार की लहर पर सवारी कर समृद्धि मिलेगी- विस्तार होगा। और इसी सोच के तहत पहली कहानी को 1 लाख की प्रोत्साहन राशि दी गयी, जबकि बाकी 15 कहानियों को 5 हज़ार की राशि। ये उनके कृतित्व का मूल्य नहीं है। एक उकसावा है कि वे रचें और उद्दाम वेग से आगे बढ़ें।

ये जलसा हर साल होगा। हर साल हरे मैदान पर सूरज दिन भर सफ़र करेगा। और नीचे काग़ज़ पर लल्लनटॉप के पाठकों की कल्पनाएँ। उनके आखर उजाल और अँधेरे के बीच की कहानियाँ कहेंगे। हर साल चुनिन्दा कहानियाँ किताब की शक्ल में आपके सामने आयेंगी।

और अन्त में एक प्रार्थना रह जायेगी कि सब कुछ बीतने पर भी जो बात बनी रहती है, वह यूँ ही आगत के लिए काग़ज़ों पर उतरती रहे कि कहानियाँ कही सुनी और पढ़ी जाती रहें और हम यूँ ही एक शब्द की उँगली पकड़ हर बार एक नयी दुनिया में उतरते रहें। और जब लौटें तो पहले से ज्यादा सरल, संयत और सहज होकर।

Details of Book :-

Particulars

Details (Size, Writer, Dialect, Pages)

Name of Book:१६ लल्लनटॉप कहानियाँ | 16 Lallantop Kahaniyan
Author:Avinash Mishra
Total pages:101
Language: हिंदी | Hindi
Size:1.1 ~ MB
Download Status:Available


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