उसने कहा था और अन्य कहानियाँ | USNE KAHA THA AUR ANYA KAHANIYAAN HINDI BOOK PDF DOWNLOAD

Usne Kaha Tha Aur Anya Kahaniyaan

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पुस्तक का संक्षिप्त विवरण:

'उसने कहा था' आधुनिक हिन्दी कहानी का पहला ज्योति स्तम्भ है। यह भी कि 'उसने कहा था' व उसके रचनाकार चन्द्रधर शर्मा गुलेरी को, एक दूसरे का पर्याय कहा जाता है। लोकप्रिय मान्यता यही है। किन्तु यथार्थ यह है कि हिन्दी कहानी में यथार्थवाद का पहला स्वर गुलेरी जी की लेखनी से उभरा, जिस पर प्रेमचन्द ने सान चढ़ाई।

गुलेरी जी का जन्म 7 जुलाई 1883 को जयपुर (राजस्थान) में हुआ था। उनकी पूर्वज-परम्परा अविभक्त पंजाब और आज के हिमाचल प्रदेश के काँगड़ा अँचल के गुलेर गाँव से सम्बद्ध थी। इसीलिए उन्होंने नाम के अन्त में, कोई लेखकीय उपमान जोड़ने के बजाय 'गुलेरी' जोड़ा। वली औरंगाबादी की तर्ज पर गुलेर का 'गुलेरी' कहीं यह भी पढ़ा था कि गुलेरी जी के पुरखे काँगड़ा भी सहारनपुर के किसी स्थान से उखड़ कर गए थे। यदि यह तथ्य हो तो उनकी पितृ-परम्परा त्रिस्तरीय ठहरती है- सहारनपुर से काँगड़ा और काँगड़ा से जयपुर।

चन्द्रधर शर्मा के पिता पं. शिवराम शर्मा वास्तविक अर्थों में पंडित थे। धर्म, न्याय, तर्क आदि के प्रकाण्ड विद्वान। उनकी इसी ख्याति से प्रेरित होकर जयपुर के महाराजा रामसिंह ने उन्हें अपने दरबार में 'राजपंडित' के पद पर प्रतिष्ठित किया। घटना यूँ हुई कि काशी में धर्माचार्यों की एक विराट सभा हुई, जिसमें देश-भर के संस्कृत विद्वान उपस्थित हुए। पं. शिवराम शर्मा ने भी उसमें भाग लिया और सभी उपस्थित धर्माचार्यों से शास्त्रार्थ करके विजयी हुए। उनकी इस ख्याति ने उन्हें जयपुर दरबार के राजपंडित पद तक पहुँचाया। फिर तो वह जयपुर के होकर ही रह गए। वहीं चन्द्रधर शर्मा का जन्म हुआ।

चन्द्रधर जी ने 1897 में मिडिल की परीक्षा पास की और 1899 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से प्रथम श्रेणी में मैट्रिक उत्तीर्ण हुए। आगे चलकर 1903 में उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि अर्जित की। उनकी औपचारिक शिक्षा की जानकारी यहीं तक है। किन्तु एक संस्कृतज्ञ पिता के पुत्र होने के नाते, और आगे चलकर संस्कृत साहित्य व प्राच्य विद्या के जिन शीर्ष पदों पर वे अधीष्ठित हुए, उस सबको ध्यान में रखते हुए, मानना पड़ता है कि संस्कृत साहित्य, व्याकरण, न्याय, दर्शन तथा ज्ञान की अन्य शाखाओं का उच्च अध्ययन उन्होंने पिता के मार्गदर्शन में सम्भवतः घर पर ही अनौपचारिक रूप से किया होगा। तभी वे मेयो कालेज, अजमेर के संस्कृत विभाग के अध्यक्ष पद तक पहुँचे और बाद में श्री मदन मोहन मालवीय के आमन्त्रण पर बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के प्राच्य विभाग के प्राचार्य पद पर आसीन हुए। वहीं 12 सितम्बर 1922 को मात्र 39 वर्ष की अल्प वय में उनका निधन हुआ।

चन्द्रधर जी देश-भाषा के उत्थान और ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में राष्ट्रीय पहचान को लेकर, मैट्रिक के बाद ही सक्रिय हो गए थे। सन् 1900 में उन्होंने जयपुर में 'नागरी भवन' की स्थापना की और उसके बाद 1902 में जयपुर वेधशाला के जीर्णोद्वार में उन्होंने निर्णायक भूमिका निभाई।

साहित्य-सृजन और साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में भी उनकी सक्रियताएँ औपचारिक शिक्षा समाप्त करने के साथ ही लक्ष्य की जाने लगी थीं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण करने के तत्काल बाद उन्होंने जयपुर से 'समालोचक' नाम से एक पत्र निकाला था। जो सम्भवतः साहित्यालोचन केन्द्रित हिन्दी का पहला पत्र था। 'समालोचक' सम्भवतः दो वर्ष चलकर बन्द हो गया।

'समालोचक' का प्रकाशन 1903-04 में हुआ और उसी समय उनके व्यक्तित्व में समाहित रचनाकार ने सिर उठाया। उनकी पहली कहानी 'घंटाघर' 1904 में 'वैश्योपकारक' पत्र में प्रकाशित हुई। यह स्पष्ट नहीं है कि चन्द्रधर शर्मा ने अपने नाम के आगे स्थानवाची 'गुलेरी' शब्द जोड़ना कब शुरू किया। अनुमान किया जा सकता है कि लेखक के रूप में सामने आने के साथ ही सम्भवतः गुलेर के साथ अपनी पहचान सम्बद्ध करने का विचार उनके मन में आया होगा।

'घंटाघर' के लेखन-प्रकाशन से शुरू हुआ गुलेरी जी का लेखक जीवन 1922 में असामयिक निधन तक अनवरत चलता रहा।

गुलेरी जी की साहित्यिक पहचान मूलतः कहानीकार के रूप में है और उसका भी रकबा बहुत छोटा है। कुल तीन कहानियाँ- 'सुखमय जीवन', 'बुद्ध का कॉंटा' और 'उसने कहा था'। इन तीन में भी यशस्वी सिर्फ़ 'उसने कहा था' हुई। पहली कहानी 'घंटाघर' का कहीं कोई उल्लेख नहीं। कोई 80-85 साल तक गुमनामी में विस्मृत रहने के बाद उसका उद्धार 'गुलेरी रचनावली' के सम्पादक मित्रवर स्वर्गीय डॉ. मनोहरलाल के हाथों हुआ। उसके बाद भी वह चर्चा से लगभग बाहर रही। आज उसका पुनर्पाठ करते हुए इस बात की गहरी प्रतीति होती है कि 'घंटाघर' न सिर्फ़ गुलेरी जी की, बल्कि समग्र आधुनिक हिन्दी कथा-साहित्य की एक बहुत मूल्यवान कृति है। और उसका स्थान प्रेमचन्द की अमर कहानी 'कफ़न' के समानान्तर है।

खैर, गुलेरी जी के कहानीकार की चर्चा तो आगे होगी ही, यहाँ यह बात विशेष रूप से गौर करने की है, कि उन्होंने सिर्फ़ कहानियाँ ही नहीं लिखीं, बल्कि आधुनिक हिन्दी साहित्य के उस प्रारम्भिक काल में गुलेरी जी ने निबन्ध, आलोचना-समीक्षा, विमर्श और शोध जैसी लगभग अविकसित विधाओं को भी समृद्ध किया। और उनकी लेखनशैली भी एकदम अनूठी और बहुत प्रभावपूर्ण थी। वे अपने निबन्धों में भी छोटी-छोटी भावपूर्ण और व्यंग्य-व्यंजित कहानियाँ पिरोते रहते थे, जिनमें से कई यहाँ संकलित की गई हैं।

गुलेरी जी की लेखनशैली के बारे में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का मंतव्य ध्यान देने योग्य है। शुक्ल जी के अनुसार, "गुलेरी जी एक बहुत ही अनूठी लेखनशैली लेकर साहित्य-क्षेत्र में उतरे थे। ऐसा गम्भीर और पांडित्यपूर्ण हास, जैसा उनके लेखों में रहता था, और कहीं देखने में नहीं आया। अनेक गूढ़ शास्त्रीय विषयों तथा कथा-प्रसंगों की ओर संकेत करती हुई उनकी वाणी चलती थी। 

Details of Book :-

Particulars

Details (Size, Writer, Dialect, Pages)

Name of Book:उसने कहा था और अन्य कहानियाँ | Usne Kaha Tha Aur Anya Kahaniyaan
Author:Chandradhar Sharma Guleri
Total pages:75
Language: हिंदी | Hindi
Size:3.5 ~ MB
Download Status:Available


Usne Kaha Tha Aur Anya Kahaniyaan written by Chandradhar Sharma Guleri | Ebook size 3.5 MB | Includes 75 Pages | Find the free PDF download link of “Usne Kaha Tha Aur Anya Kahaniyaan” below and read it right away.

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